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शहीद जवानों को नसीब हुई पहले कचरा गाड़ी और फिर दो शहीदों के पार्थिव शरीर को नसीब हुई एक एम्बुलेंस – किरंदुल के शहीद पोलिस जवानों को छत्तीसगढ़ राज्य सरकार का सम्मान -

Posted On: 29 Jun, 2011 Others में

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शहीद जवानों को नसीब हुई पहले कचरा गाड़ी और फिर दो शहीदों के पार्थिव शरीर को नसीब हुई एक एम्बुलेंस –
किरंदुल के शहीद पोलिस जवानों को छत्तीसगढ़ राज्य सरकार का सम्मान –

अभी दो दिन पहले मैंने अपने लेख “ भ्रष्टाचार और अपराध की गिरफ्त में अमीर प्रदेश गरीब लोग ” में लिखा था कि “ राज्य शासन और संबंधित अधिकारियों को जिस संजीदगी को माओवाद से निपटने के लिये दिखाना चाहिये , उसका अभाव सोच के स्तर से लेकर योजना के स्तर तक स्पष्ट दिखाई पड़ता है | ” और आज दो दिनों के भीतर मानो राज्य शासन ने उस पर मोहर लगाने के लिये किरंदुल में माओवादियों के हमलों में शहीद हुए पोलिस जवानों के पार्थिव शरीर को कचरा ढोने वाले वाहन में मुख्यालय बुलवाया , किसलिए , ताकि दंतेवाड़ा मुख्यालय में उनको सम्मान देकर , उनके पार्थिव शरीरों को ससम्मान उनके गृहग्राम भिजवाया जाये | कारगिल के शहीदों की याद में हर साल टसुए बहाने वाली भाजपा की राज्य सरकार की खुद के प्रदेश में माओवाद के खिलाफ लड़ने वाले और शहीद होने वाले अपने सिपाहियों के प्रति संवेदना और सम्मान व्यक्त करने का तरीका देखिये कि उनके शवों के नगरपालिका की कचरा गाड़ी में रखकर बुलवाया गया |

माओवाद को छत्तीसगढ़ से जड़मूल से उखाड़ फेंकने का दम दिखाते रहने वाले प्रदेश के डीजीपी विश्वरंजन जी की मजबूरी और असहायता देखिये वो कहते हैं कि उस समय कोई एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं थी , केवल नगरपालिका का वाहन ही उपलब्ध था और जिसे वो वाहन कह रहे हैं , वह कचरा वाहन है | हाँ , उन जवानों के पार्थिव शरीर और उनके परिजनों पर मानो बहुत बड़ा उपकार किया गया हो , वे कहते हैं कि पहले उस कचरा गाड़ी की अच्छे तरीके से साफ सफाई कर दी गयी थी | वे सभी जो दंतेवाड़ा से आगे की भौगोलिक परिस्थिति से ज़रा भी वाकिफ हैं , अच्छी तरह से जानते हैं कि जहां इन जवानों की मृत्यु हुई उसके नजदीक ही किरंदुल बड़ी जगह है और बचेली है , जहां सभी तरह की सहूलियतें , एम्बुलेंस सहित आसानी से उपलब्ध हैं | बचेली में एनएमडीसी की रिहाईशी कालोनी है | वैसे भी अगर शासन ने एनएमडीसी से ही कहा होता तो एम्बुलेंस क्या कोई अन्य बड़ा वाहन भी आसानी से उपलब्ध हो सकता था , परन्तु उसके लिये जिस संजीदगी और संवेदना की आवश्यकता होती है , वह छोटे कर्मचारियों के मरने पर दिखाने के लिये शासन के पास होती कहाँ है ?
सम्मान देने का ढंग का एक नमूना और तुरंत दिखाई दिया कि जशपुर के दो सिपाही लक्ष्मण भगत और अरशन लकड़ा , जिनके गृहग्राम जशपुर जिले में हैं , क्रमशः महुआ टोली और गड़ला , उनके पार्थिव शरीरों को एक ही एम्बुलेंस में रखकर जशपुर के लिये रवाना कर दिया गया | मानो इन शहीद जवानों के सम्मान के साथ खिलवाड़ बकाया रह गया था , वह एम्बुलेंस भी रायगढ़ से कुछ पहले खराब हो गयी | चलो यह तो किसी के साथ भी हो सकता है , पर हद तो तब हुई , जब दंतेवाड़ा और रायगढ़ दोनों जगह उनके परिजनों के द्वारा पोलिस के एवं अन्य अधिकारियों के साथ संपर्क करने के बाद भी घंटों तक कोई मदद नहीं मिली और उनके परिजन भूखे प्यासे शहीदों के पार्थिव शरीर के साथ परेशान होते रहे |

पोलिस हो या सुरक्षा बल , इनके जवानों को हर तरह की तकलीफ झेलने के साथ ओहदे में अपने से बड़े अधिकारियों के रफ व्यवहार को झेलने की ट्रेनिंग अपने आप मिल जाती है और वे ये सब खेलते हुए ही अपने कर्तव्य का पालन करते हैं , लेकिन यदि शहादत के बाद उनके परिवार और उनके मृत शरीरों के साथ जो शासन साधारण सी संवेदनाएं भी न दिखा सके , उसके विकास और गरीबों के लिये लगाए जाने वाले नारों को टसुए बहाने से ज्यादा क्या कहा जायेगा ?

अरुण कांत शुक्ला

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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
July 1, 2011

हार्दिक आभार और धन्यवाद आप का आइये सब मिल हिंदी और साहित्य को अपने सीने से लगा इस समाज के लिए -जमीनी सच्चाई में उतर कुछ करें -शुभ कामनाएं शुक्ल भ्रमर ५

    aksaditya के द्वारा
    July 2, 2011

    धन्यवाद सुरेन्द्र जी , आपके दोनों विचारों के लिये .

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 29, 2011

आदरणीय महोदय मेरी बात के मायने दो *शवों की सुरक्षा के लिहाज से यह एहतियाती कदम उठाया गया होगा *हत्यारों के डर से शहीदों को उचित सन्मान नहीं दिया ताकि वोह नाराज़ ना हो जाए कहीं या फिर सन्मान देने वालो को ही अपना अगला निशाना ना बना ले खैर सच्चाई चाहे जो भी हो इसे सरकार तथा प्रशाशन की दूरदर्शिता ही कहा जाना चाहिए धन्यवाद

    aksaditya के द्वारा
    June 29, 2011

    आदरणीय शर्मा जी , आप जैसा कह रहे हैं , वैसा कुछ भी नहीं है | यह केवल उस सोच का नमूना है जिसमें निचले तबके को चाहे वो समाज में हो या नौकरी में हमेशा तुच्छ समझा जाता है | न ही यह प्रशासन की दूरदर्शिता है , वो चाहते तो सब व्यवस्था कर सकते थे | जहां तक एक एम्बुलेंस में दो शव ले जाने का सवाल है , यह सुरक्षा के कारण नहीं , सिर्फ उपरोक्त भावना के कारण ही किया गया | इसीलिये रायगढ़ के पास जब एम्बुलेंस खराब हुई तो मृत जवानों के पिरजनों ने कहा भी कि क्या कोई चहेता के साथ ऐसा होता , तब भी क्या , प्रशासन ऐसा ही करता ?

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 30, 2011

    आदरणीय सर जी …सादर प्रणाम ! मैंने अपनी बात वयंग्य में कही थी लेकिन आप उसको दूसरे ढंग से ले गए खैर कोई बात नहीं होता है -होता है धन्यवाद

    aksaditya के द्वारा
    June 30, 2011

    हा.. हा.. अब आप समझ गये होंगे कि मैं कितना भोला हूँ . हा..हा..

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 2, 2011

    आदित्य जी ये राज जी की बाते बड़े गौर से सुन फिर समझनी पड़ती हैं -इन्होने सच ही कहा लेकिन अपनी कला के अनुसार -इसे सरकार तथा प्रशाशन की अ-दूरदर्शिता ही कहा जाना चाहिए-इन सब मामलों में तो सरकार बड़े दूर की सोच रखती है अपनी जान के भय से कहीं भी फेंक दें शव को -फिर ढकोसला क्यों और राज काज चलने की मंशा क्यों ? सार्थक लेख बधाई

Manoj के द्वारा
June 29, 2011

अब इस खबर को सुन कौन सा युवा खुद को देश का सिपाही बनाने की खतरा मोल लेगा.. देश में हमेशा यह बात च्जलती है कि युवा सेना में भर्ती होने से कतराते हैं और प्राइवेट जॉब की तरफ भाग रहे हैं लेकिन जब देश के महान वीर सिपाहियों को मौत के बाद कचरे की गाड़ी नसीब हो तो बाकि क्या सोचे… एक छोटी सी घटना ने ना जानें कितने सवाल खड़े कर दिए हैं…

    aksaditya के द्वारा
    June 29, 2011

    आपका कहना सही है , मनोज भाई | धन्यवाद |

Y.DUBEY के द्वारा
June 29, 2011

आदरणीय शुक्ल जी, ये उतना भी महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है जितना बड़ा आप दिखा रहे हो,पहले आप स्पस्ट करे की कचरे के साथ लाया गया या फिर उस गाड़ी पर लाया गया जिस पर दो या तीन दिन पहले कचरा धोया गया था ,राज्य सरकार की शहीद जवानों के प्रतिबद्धता को आप इस तरह से ख़ारिज नहीं कर सकते है दोनों जवानों को मरणोपरांत १ लाख रूपये का मुवायजा घोषित हुआ है खुद मुख्यमंत्री ने शोक जताया,विरोध कीजिये इस बात का की हमारे गृहमंत्री ने मओवादियो के विरुद्ध सेना का उपयोग की घोसना के पीछे क्यों हट गए , मओवादियो पर सेना को हवाई हमलो की इजाजत क्यों नहीं देते ,उससे बड़ा जवानों का अपमान मुझे आपके लेख के इस लाइन में नजर आता है “कारगिल के शहीदों की याद में हर साल टसुए बहाने वाली भाजपा की राज्य सरकार ” आपकी दिक्कत यही है की वहा पर भाजपा की सरकार क्यों है ,लिखिए इस बात पर की रमण सरकार की वह कौन सी नीतिया है जिस वजह से वहा के लोगो ने हथियार उठाने पर मजबूर हुए ,क्योकि आप जानते है की ये सभी माओवादी अजित जोगी के समय से पहले के है .

    aksaditya के द्वारा
    June 29, 2011

    आदेनीय दुबे जी , किसी मुद्दे के महत्वपूर्ण होना या न होना तो अलग अलग लोग अपनी अपनी समझ के अनुसार निर्शारित करेंगे , इसलिए उस पर मुझे कुछ नहीं कहना | जहां तक मुआवजे का प्रश्न है वह राज्य शासन ने घोषित नीती के अनुसार ही दिया है , शोक जताना भी , उसी प्रक्रिया का हिस्सा है | ये दोनों काम , जब कोई एक्दीसेंत होता है , उसमें भी रूटीन तरीके से किये जाते हैं | सवाल भाजपा की सरकार होने पर भी प्रश्न खड़े करने का नहीं है , क्योंकि वह प्रदेश की निर्वाचित सरकार है , कोई इसे माने या न माने | पर जिस किसी भी दल की सरकार हो , आलोचनाएं तो उस दल विशेष के प्रतीक गुणों के साथ ही की जाती हैं , इसीलिये कारगिल का उल्लेख हुआ | मेरा लेख माओवाद के पैदा होने के संबंध में नहीं था | वैसे जिन नीतियों के कारण देश में माओवाद पैदा हुआ है , भाजपा उँ नीतियों पर ही कहलाती है | और भाजपा ही क्यों , भारत के कमोबेश सभी राजानीतिक पार्टियां उन्हीं नीतियों पर चलाती हैं | वह एक अलग विषय है | सेना के उपयोग करने या न करने का विषय बहुत गंभीर है | उस पर यहाँ चर्चा न जरूरी है और न ही शायद हम उपयुक्त पात्र | आपके कमेन्ट के लिये धन्यवाद |

Abdul Rashid के द्वारा
June 29, 2011

बेईमान व भरष्ट राजनीति में बस यही देखना बाकी रह गया है. अफ़सोस तो उनलोगों पर भी होता है के ऐसे अधिकारी को किस बात की तनख्वाह मिलती है जिन्हें शहीदों का सम्मान भी नहीं करना आता. http://singrauli.jagranjunction.com

    aksaditya के द्वारा
    June 29, 2011

    रशीद भाई , आपका कहना सत्य है | धन्यवाद |

shaktisingh के द्वारा
June 29, 2011

आपने काफी संवेदना से भरा लेख लिखा है. सरकार के सामने आम लोगों की कोई इज्जत नहीं, लेकिन सरकार को यह समझना चाहिए कि जो उन्हें सुरक्षा दे रहे है कम से कम उन्हें तो इज्जत दे.

    aksaditya के द्वारा
    June 29, 2011

    आपका कथन सही है | इससे न केवल सुरक्षा बलों के मनोबल पर असर पड़ता है ,बल्कि वे सारा फ्रस्ट्रेशन बाद में आम लोगों पर निकालते हैं | कमेन्ट के लिये आपको धन्यवाद |


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