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मनमोहनसिंह –एक आत्मनिष्ठ , आत्ममुग्ध , अमेरिका परस्त प्रधानमंत्री— Jagran Junction Forum

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मनमोहनसिंह , राष्ट्र तथा कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी में से किसके प्रति निष्ठ हैं ? या , मनमोहनसिंह , अभी तक के सबसे ज्यादा लाचार , असमर्थ औररिमोट कंट्रोल से याने सोनिया गांधी के निर्देशों पर चलने वाले प्रधानमंत्री हैं या उनमें त्वरित और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता नहीं है | ये वे आरोप हैं ,जो उनके विरोधी तबसे लगा रहे हैं , जबसे मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री बने हैं | विशेषकर भाजपा , आरएसएस और आरएसएस के विहिप जैसे अनेक संगठनतथा स्वयं लालकृष्ण आडवानी ने इन आरोपों को इतनी बार दोहराया है कि मनमोहनसिंह के बारे में वो ज्यादा संगीन सच्चाई , जो देश के लोगों के सामनेआना चाहिये थी , दब कर रह गयी है |

इतिहास मात्र घटनाओं का अभिलेख नहीं होता बल्कि घटनाओं के परिणामों की विवेचना और समालोचना का रिकार्ड भी होता है | जब कभी मनमोहनसिंह के ऊपर लगने वाले इन आरोपों की विवेचना होगी , तब इतिहास में यह भी दर्ज होगा कि भारत में मनमोहनसिंह ने वर्ष 1991 में नवउदारवाद की जिननीतियों के रास्ते पर देश को डाला , उसके बाद आने वाली सभी सरकारें , उन्हीं नीतियों पर चलीं , जो अमेरिका परस्त थीं और जिन पर चलकर देश कीजनसंख्या का एक छोटा हिस्सा तो संपन्न हुआ लेकिन बहुसंख्यक हिस्सा बदहाली और भुखमरी को प्राप्त हुआ | इतिहास में यह भी दर्ज होगा कि 1991 केबाद के दो दशकों में भारत में शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल रहा हो , जो सत्ता में न आया हो या जिसने सत्ता में मौजूद दलों को समर्थन न दिया हो |इसलिए जब भी मनमोहनसिंह के ऊपर सोनियानिष्ठ होने के आरोप लगाए जाते हैं तो राजनीतिक दलों का असली उद्देश्य मनमोहनसिंह के अमेरिका परस्तया वर्ल्ड बेंक परस्त चहरे को छिपाना ही होता है क्योंकि पिछले दो दशकों में सत्ता का सुख प्राप्त कर चुके सभी दल अमेरिका परस्त रह चुके हैं और इस मामलेमें कोई भी दूध का धुला नहीं है | यहाँ तक कि देश का मीडिया भी , विशेषकर टीव्ही मीडिया और बड़े अंग्रेजी दां अखबार भी इसमें शामिल हैं |

मनमोहनसिंह सत्ता प्रतिष्ठान से नजदीकी बनाए रखने वाले एक चतुर आत्मनिष्ठ नौकरशाह –

आजादी के बाद से लेकर अभी तक देश के किसी भी प्रधानमंत्री के बारे में इतनी बार और इतनी दावे के साथ यह कभी नहीं कहा गया कि वो व्यक्तिगत रूप सेबहुत ईमानदार और सत्यनिष्ठ हैं , जितनी बार मनमोहनसिंह के बारे में कहा गया है | यहाँ तक कि उन्होंने स्वयं अपने को यह सर्टिफिकेट अनेक बार दियाहै | यह बात अलग है कि बेईमानों को खुली छूट देकर , ईमानदार बने रहने के उनके इस गुण के कायलों की संख्या धीरे धीरे कम होती जा रही है | पर , जिसबात के लिये उनकी तारीफ़ करनी होगी , वह है सत्ता प्रतिष्ठान के साथ हमेशा नजदीकी बनाए रखने की उनकी बेशुमार योग्यता |

मनमोहनसिंह राजनीतिक पटल पर अचानक उभरे , जब 1991 में उन्हें भारत का वित्तमंत्री , तब बनाया गया , जब देश एक आर्थिक संकट के दौर से गुजररहा था | उसके पूर्व , मनमोहनसिंह भारत सरकार में वित्त सचिव , रिजर्व बेंक के गवर्नर और भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार के रूप में विभिन्न पदोंपर काम कर चुके थे , पर , कभी भी उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को खोलने और लायसेंस – परमिट राज को समाप्त करने की बात नहीं की या उसकीमुखालफत नहीं की | यह समय , याने 1991 के पूर्व का समय , वह दौर था जब भारतीय राजनीति में सभी आर्थिक और सामाजिक मामलों को भारत केअंदर ही सुलझा लेना सम्मानजनक समझा जाता था और किसी भी तरह की विदेशी दखलंदाजी को हेय नज़रों से देखा जाता था | आज की दुनिया में एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रूप में प्रतिष्ठित मनमोहनसिंह को भी उस समय नेहरूवियन नीतियों से कोई गुरेज नहीं था क्योंकि सत्ता प्रतिष्ठान उन्हें मानता था |भारत के सत्ता प्रतिष्ठान के साथ इस नजदीकी का लाभ उन्हें यह मिला कि वे साऊथ एशिया के विभिन्न पदों पर से होते हुए वर्ल्ड बेंक से भी जुड़े | 1991 में , जब यह स्पष्ट हो गया कि अंतर्राष्ट्रीय देनदारियों से निपटने के लिये अब भारत के सम्मुख वर्ल्ड बेंक से लोन लेने के अतिरिक्त कोई और चारा नहीं है और वर्ल्ड बेंक की शर्तें ही देश की आगे की राजनीती को निर्देश देंगी , उन्हें अपनी निष्ठा तुरंत नेहरूवियन नीतियों से बदलकर , अमरीकीपरस्त करने में कोई देर नहींलगी | और वह व्यक्ति , जिसने कभी उन नीतियों के खिलाफ मुँह नहीं खोला था , वित्तमंत्री बनते ही अपने पहले बजट भाषण में बोला कि “लम्हों ने खता की थी , सदियों ने सजा पाई” | इसीलिये पूर्व रक्षामंत्री नटवरसिंह ने कुछ समय पूर्व दावा किया था कि मनमोहनसिंह को वित्तमंत्री वर्ल्ड बेंक के दबाव में बनाया गया था | इससे पता चलता है कि मनमोहनसिंह के लिये सत्ता में बने रहना हमेशा एकमात्र उद्देश्य रहा है और उनकी स्वयं की कोई निष्ठा नहीं है | वे आत्मनिष्ठ हैं |

एक आत्ममुग्ध प्रधानमंत्री –

मनमोहनसिंह एक आत्ममुग्ध प्रधानमंत्री हैं | यह उनके स्वभाव की विशेषता है | जब वे वित्तमंत्री थे , देश में किसान आत्महत्या कर रहे थे ,पर , मनमोहनसिंह शेयर बाजार की उछालों को अपनी कामयाबी बता रहे थे , जिसका भांडा जल्दी ही फूट गया | अभी हाल ही में प्रमुख अखबारों के संपादकों के प्रश्न पूछने पर कि सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी सरकार के खिलाफ कड़ी टिप्पणियाँ की हैं , उन्होंने कहा कि “ मैंने जजों से बात की है – और उन्होंने कहा है कि उन्हें (जजों को ) मामले अपना मंतव्य स्पष्ट करने के लिये ऐसे सवाल जबाब करने पड़ते हैं | उन्होंने (जजों ने ) कहा कि मीडिया जिस तरीके से रिपोर्ट करता है , समस्या उससे पैदा होती है | मैं ( मनमोहनसिंह स्वयं ) सोचता हूँ कि प्रत्येक को संयम दिखाना चाहिये | जब मैं ( मनमोहनसिंह ) जजों से बात करता हूँ , वे कहते हैं कि वह सब हमारा उद्देश्य नहीं है , आदेश या निर्देश भी नहीं है | प्रेस की रिपोर्टों से सनसनी फैलती है |” यह आत्ममुग्धता की पराकाष्टा है | क्या गोदामों में सड़ने वाला चावल , गरीबों में बांटने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को देश के सर्वोच्च न्यायालय का प्रलाप कहा जा सकता है , जिसका कोई उद्देश्य न हो |

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि मनमोहनसिंह के इस बयान के दो दिन बाद ही सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल यूपीए सरकार को फटकार लगाई , बल्कि , निगरानी के लिये एक विशेष टीम भी गठित कर दी | यह बताता है कि वे वर्ल्ड बैंक और ओबामा के आदेशों के अलावा किसी को कुछ नहीं समझते और दुर्भाग्य से केवल अपनी ही नहीं देश की सफलता के भी उसी आधार पर आंकते हैं |

प्रतिबद्धता के अनुसार निर्णय लेने में लचर नहीं -

वे सभी जो यह सोचते हैं कि प्रधानमंत्री निर्णय लेने में अक्षम हैं या उनकी प्रशासनिक योग्यता लचर है , पूरी तरह गलत हैं | उनकी निर्णय लेने की क्षमता को उनकी नवउदारवाद के प्रति प्रतिबद्धता से आंकिये , सब स्फटिक की भांती साफ़ हो जायेगा |

मनमोहनसिंह ने अनेकों बार दावा किया कि वे गाँव के रहने वाले हैं , लेकिन उनका ह्रदय धनी और कारपोरेट भारत के लिये व्याकुल होता है , देश के गरीबों के लिये नहीं | इसके अनेक उदाहरण हैं | रोजगार गारंटी योजना बनाने में यूपीए को पूरे दो साल लग गये , जबकि सेज का क़ानून तुरंत पेश कर दिया गया | राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना बनाने में दो वर्ष से अधिक का समय लगा , लेकिन विश्वव्यापी मंदी ( जिसका असर भारत के उद्योगपतियों पर नहीं के बराबर हुआ , उलटे उसकी आड़ में उद्योगपतियों ने लोगों के रोजगार छीने गये ) के समय उद्योगपतियों को अनाप शनाप पैकेज देने में उन्हें कोई वक्त नहीं लगा | इस तरह के अनेकों उदाहरण दिए जा सकते हैं , जो यह बताएँगे कि वे उनकी प्रतिबद्धता के हिसाब से निर्णय लेने में कभी नहीं हिचकिचाते | हाल में जिस खाद्य सुरक्षा क़ानून को सरकार अनेक कारण बताते हुए लाने में हिचक रही है , उसके पीछे भी प्रधानमंत्री और उनका थिंक टेंक ही है | वस्तुस्थिति यह है कि मनमोहनसिंह यह अच्छी तरह जानते हैं कि जब तक विश्व बेंक , आईएमएफ , डब्लूटीओ और अमेरिका का वरदहस्त उनके साथ है , तब तक कांग्रेसमें उनको कोई कुछ कर नहीं सकता |

अंतिम बात , भ्रष्टाचार , अक्षमता और अन्य तरह के अनेकों आरोप उन पर लगने के बावजूद वे यही कहते हैं कि अभी उनको दिया गया काम अधूरा है और उसे किये बगैर वे पद से नहीं हटेंगे | उन्होंने केवल एक बार प्रधानमंत्री के पद को छोडने की धमकी दी और पूरी कांग्रेस को न केवल उनके सामने झुकना पड़ा बल्कि सरकार के गिरने के खतरे को भी झेलना पड़ा | जानते हैं , कब , जब भारत –अमेरिका परमाणु समझौते के समय उन्हें ऐसा लगा कि कांग्रेस में सब लोग उनके साथ नहीं हैं , तब | क्या इससे पता नहीं चलता कि उनकी प्रतिबद्धता किसके साथ है ?

अरुण कान्त शुक्ला

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Alejandra Fluellen के द्वारा
March 23, 2017

I’ve got young plants in the garden, all of them that I’ll be growing except for a couple of squash (assuming that the rabbits don’t eat the baby seedlingsI’m not sure of their status this year) and some beans. There’s nothing to harvest except the leftover scallions from last year, but I’ve got my eye on some green strawberries, the greens (especially the rocket), and the parsley plants, which are doing much much better this year than they did last year. Immediate garden tasks: clean up the corner of the garden where those squash and beans are supposed to go and plant, and do a heck of a lot of weeding.

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 10, 2011

सर जी …..सादर अभिवादन ! आप शायद एक भूल कर रहे है हरेक सरकार अब अमेरिका परस्त ही होती है बी.जे.पी. ने सिर्फ छह दिन की सरकार की सबसे पहली कैबिनट की मीटिंग में सिर्फ एक ही सौदे को मंजूरी दी थी और वोह था एनरान इतनी क्या एमरजेंसी थी उनको की एक अल्पमत सरकार जिसने की अभी बहुमत भी साबित नहीं किया वोह उस सोडे को मंजूर करने को इतनी अधीर दिखी क्या और कोई फैसला उस मीटिंग में लिया गया ?

    aksaditya के द्वारा
    July 10, 2011

    आदरणीय शर्माजी , आपका कथन सत्य है | मैंने यह बात लेख के प्रारंभ में ही स्पष्ट की है और यह भी कहा है कि कोई भी राजनैतिक दल दूध का धुला नहीं है | चूंकि , लेख का विषय मनमोहनसिंह की निष्ठा के बारे में है और उन पर सोनिया के प्रति निष्ठा रखने के आरोप लगाए जाते हैं , मैंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि ये आरोप केवल भारत में सत्ता प्राप्त करने की राजनैतिक दलों की आपसी लड़ाई है | जब बीजेपी नीत एनडीए की सरकार थी , तब उस पर संघ के अनुसार चलने के आरोप लगते थे , पर वास्तविकता यह है कि राष्ट्रवाद के तमाम नारों के बावजूद वह संघ हो या भाजपा , हैं अमरीका परास्त ही | 1991में जिस रास्ते पर भारत को डाला गया है , वह उसे अमरीका का पिछलग्गू ही बनाता है | आपके विचारों के लिये बहुत बहुत धन्यवाद |

Tamanna के द्वारा
July 9, 2011

जब उन्हें प्रधानमंत्री बनाया ही केवल कॉग्रेस के लिए है तो स्वभाविक रूप से वे केवल कॉग्रेस का ही साथ देंगे.. उनका कभी भी राष्ट्र के लिए प्रतिबद्ध प्रधानमंत्री के रूप में नहीं किया गया. http://tamanna.jagranjunction.com/2011/07/09/homosexuality-and-gay-rights-in-india/

    aksaditya के द्वारा
    July 9, 2011

    तमन्ना जी , अभिवादन . वो कांग्रेस में इसलिए हैं कि उन्हें कांग्रेस ने पहली बार वित्तमंत्री बनाया | वरना , जिस लोकसभा के चुनाव के बाद वो नरसिम्हाराव के मंत्रीमंडल में वित्तमंत्री बने थे , वर्ल्ड बैंक ने उनके वित्तमंत्री बनाने की घोषणा उस चुनाव के पहले ही कर दी थी , चाहे कोई भी दल सत्ता में आता | आपके कमेन्ट के लिये धन्यवाद |

shaktisingh के द्वारा
July 9, 2011

सुन्दर लेख के लिए बधाई हो, अब तो उनकी इतनी छींटाकशी हो चुकी है कि उन्हें अपने पद के दायित्व को समझना चाहिए,

    aksaditya के द्वारा
    July 9, 2011

    जिसकी प्रतिबद्धता की जड़ें राष्ट्र के बाहर हों , वो अपने पद के दायित्व को कैसे समझेगा ? आपके कमेन्ट के लिये धन्यवाद |

santosh kumar के द्वारा
July 9, 2011

आदरणीय अरुण जी , सादर प्रणाम …….. सरदार डॉ. मनमोहन सिंह किसी भी प्रकार से पूरे भारतवर्ष के प्रधानमंत्री जैसा आचरण नहीं कर रहे हैं वो सिर्फ और सिर्फ गाँधी & संस के लिए काम कर रहे हैं/

    aksaditya के द्वारा
    July 9, 2011

    आदरणीय संतोष जी , हमें ऐसा प्रतीत होता है कि मनमोहनसिंह जी गांधी एंड सन’स के लिये कार्य कर रहे हैं | दरअसल , वे तो सिर्फ और सिर्फ वर्ल्ड बैंक और अमेरिका के लिये कार्य कर रहे हैं | आपके कमेन्ट के लिये धन्यवाद |

nishamittal के द्वारा
July 9, 2011

आदरनीय आदित्य जी,आपकी निष्ठां` सराहनीय है.परन्तु मनमोहन जी के गुणों को ग्रहण उनकी प्रतिबद्धता सोनिया गाँधी के प्रति होने का कारण लगा है,प्रतिबद्धता देश के प्रति होनी चाहिए न की व्यक्तिविशेष के प्रति.

    aksaditya के द्वारा
    July 9, 2011

    आदरणीय निशाजी , हमें ऐसा प्रतीत होता है कि मनमोहनसिंह जी के गुणों को ग्रहण सोनिया गांधी के प्रति प्रतिबद्धता के कारण लगा है . पर यदि मनमोहनसिंह के वित्तमंत्री के रूप में इस देश में पदार्पण पर ध्यान दें और उनके पिछले कार्यकाल ओअर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी प्रतिबद्धता केवल और केवल अमेरिका के लिये है | उन्हें देश के अंदर के लोगों का न तो कोई ज्ञान है और न वे उसकी चिंता करते हैं | दरअसल , वे तो सिर्फ और सिर्फ वर्ल्ड बैंक और अमेरिका के लिये कार्य कर रहे हैं | आपके कमेन्ट के लिये धन्यवाद |

dharmendra singh के द्वारा
July 9, 2011

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी आधुनिक युग के ऐसे प्रधानमंत्री है जो भारत के लिए नहीं अपितु सोनिया गाँधी ,राहुल गाँधी के लिए जवाबदेह है .वे उसी नियम का का पालन कर रहे है जो कांग्रेस के नेता करते है .अगर प्रधानमंत्री इतने इम्मंदार होते तो उन्होंने पिछले सात सालो से कौन सी निति देश के लिए बने है.जितने भी योजनाये लागू की गयी है सब N.A.C के द्वारा प्रस्तावित हुई है .अगर कोई आदमी जिसके अन्दर जमीर होता अब तक वो इस्तीफा दे चूका होता.सॉरी मनमोहन जी पर आप सिर्फ इमानदार है पर शक्तिशाली नहीं?

    aksaditya के द्वारा
    July 9, 2011

    आदरणीय धर्मेन्द्र जी , ईमानदारी एक बहुत व्यापक दायरा है , मुझे नहीं लगता कि उसमें भी वो कहीं फिट होते हैं | आखिर वैचारिक ईमानदारी ही तो व्यवाहारिक ईमानदारी की शुरुवात है | इसे कैसे भुलाया जा सकता है | आपके कमेन्ट के लिये धन्यवाद |


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