दबंग आवाज

मैं शव नहीं जो केवल नदी की धारा के साथ बहूं -

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'फिर बुद्ध मुस्कराए'

Posted On: 7 Oct, 2014 Others,कविता में

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हजारों मासूमों का वध करवाकर,
बना अशोक सम्राट,
खिलाफ अब उसके,
उठे न कोई आवाज,
हिंसा अनुचित है,
तब हुआ उसे आभास,
तब उसे बुद्ध याद आये,
कहने लगा अधीनस्थ राज्यों से,
त्यागा मैंने युद्ध,
त्यागे मैंने हथियार,
तुम भी तजकर अस्त्र-शस्त्र,
गाओ मेरे गुणगान,
तुम्हें मिलेगा मेरा अभयदान,
अब निष्कंटक राज था उसका,
बुद्ध को ही बना लिया उसने,
राज करने का हथियार,
निष्कंटक राज के मार्ग में,
थे दो ही कांटे,
उन्हें भी उसने बुद्ध हथियार से ही मारा,
बेटे और बेटी का घुटवाकर सर,
दे दिया उन्हें देश निकाला,
करने धर्म का प्रचार,
इसीलिये मेरे देश में,
या तो ‘बुद्ध मुस्कराए’ हैं या,
फिर, ‘फिर बुद्ध मुस्कराए’ हैं,

अरुण कान्त शुक्ला,
6 अक्टोबर’2014

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

s.p.singh के द्वारा
October 10, 2014

शुक्ल जी अति उत्तम,

yamunapathak के द्वारा
October 10, 2014

आदरणीय सर जी ये सच है अति हिंसा अति राग ही शान्ति और विराग की और ले जाता है. साभार


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