दबंग आवाज

मैं शव नहीं जो केवल नदी की धारा के साथ बहूं -

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झोपड़ी में भी चांदनी खिलखिलाती दिवाली में-

Posted On: 27 Oct, 2014 Others,कविता में

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फिजाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में
सिसकियाँ फिर भी सुनाई आती हैं दिवाली में,

बहुत कोशिश की हमने अँधेरे को भगाने की घर से
हँसी अँधेरे की फिर भी सुनाई आती है दिवाली में,

रोशनी से अमावस की रात यदि चांदनी खिलती
झोपड़ी में भी चांदनी खिलखिलाती दिवाली में,

कब तक देखते रास्ता लक्ष्मी का सो गए
सुना है वो सिर्फ महलों में जाती हैं दिवाली में,

नेताओं और अधिकारियों के घर भेज रहे हैं ठेकेदार मिठाई के डिब्बे
सुना है इन्हीं डिब्बों में बैठकर लक्ष्मी जाती आती हैं दिवाली में,

अरुण कान्त शुक्ला,
26 अक्टोबर’ 2014

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
October 28, 2014

“बहुत कोशिश की हमने अँधेरे को भगाने की घर से हँसी अँधेरे की फिर भी सुनाई आती है दिवाली में” सुन्दर साभार!

    aksaditya के द्वारा
    October 29, 2014

    धन्यवाद गर्ग जी..

jlsingh के द्वारा
October 27, 2014

विडम्बना ही है .. नेताओं और अधिकारियों के घर भेज रहे हैं ठेकेदार मिठाई के डिब्बे सुना है इन्हीं डिब्बों में बैठकर लक्ष्मी जाती आती हैं दिवाली में सादर!

    aksaditya के द्वारा
    October 29, 2014

    धन्यवाद सिंह साहब ..


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