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प्रधानमंत्री मोदी के लिए परीक्षा का समय..

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पठानकोट एयर बेस पर हुए फिदायीन हमले ने भारत-पाकिस्तान के संबंधों पर लगातार चलने वाली बहस को और गर्म तथा तेज कर दिया है| विशेषकर पाकिस्तान आर्मी से शह पाये आतंकवादी संगठनों द्वारा भारत में मचाये गए उत्पातों में शामिल लोगों और संगठनों के खिलाफ पाकिस्तान की नागरिक सरकार के द्वारा कोई कार्यावाही न कर पाने की असमर्थता के खिलाफ भारत में एक हार्डलाईनर समूह हमेशा सक्रिय रहा है, जो पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार के राजनीतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक तथा आर्थिक(व्यापारिक) संबंध रखने के खिलाफ रहा है| संसद भवन, अक्षरधाम,मुम्बई अथवा जम्मू-कश्मीर में आये दिन हो रहीं आतंकवादी घटनाएं जहाँ एक तरफ भारत के हार्डलाईनर्स को मदद पहुंचाती हैं जो युद्ध के अलावा अन्य कोई लालसा नहीं रखते तो दूसरी ओर पाकिस्तान की नागरिक सरकार को कमजोर करती हैं जिस पर उनकी सेना का अप्रत्यक्ष दबाव हमेशा रहता आया है|
दुर्भाग्य से, प्रधानमंत्री मोदी, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद संभालने के पहले दिन अर्थात शपथ ग्रहण से ही, किन्ही भी कारणों से, घरेलु मोर्चे से ज्यादा समय विदेशी मोर्चे और विदेश नीति को दिया है, अपने चुनाव के दौरान और चुनाव पूर्व के कथनों से भारत के हार्डलाईनर समूह के प्रतिनिधी माने जाते रहे हैं| आज जब वे पाकिस्तान के साथ वार्ता का कोई भी प्रयास करते हैं तो घर में उनकी तीव्र आलोचना होती है| प्रधानमंत्री पद संभालने के 20 माह के बाद भी वे घरेलू मोर्चे पर स्वयं अपनी उस अल्पसंख्यक, विशेषकर मुस्लिम विरोधी छवि को मिटाकर ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाली छवि को बना नहीं पाये हैं| ऐसे में पाकिस्तान के साथ बातचीत के उनके प्रत्येक प्रयास को न केवल उनकी स्वयं की पार्टी की बल्कि सियासत में उनके सहयोगियों की भी आलोचना का शिकार होना पड़ता है|
ऐसी परिस्थिति में रूस तथा अफगानिस्तान के अपने दौरे के अंत में भारत लौटते समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के निमंत्रण पर लाहोर में रुककर उन्हें जन्म दिन की बधाई तथा उपहार देने के आठवें दिन ही पठानकोट एयरबेस पर फिदायीन हमला उन्हें तथा उनकी पाकिस्तान नीति को कठघरे में खड़ा करने की नीयत से किया गया हमला लगता है| आतंकवादी, चाहे वे यूनाईटेड जिहाद काउन्सिल से हों या जैश-ऐ-मोहम्मद से या लश्करे तयबान से, अब तक हुए सभी आतंकवादी हमलों के दो मकसद हर बार स्पष्ट होकर सामने आये हैं| पहला, भारत-पाकिस्तान की नागरिक सरकारों के बीच वार्ता को बंद कराना तथा दोनों देशों के आम-लोगों के मध्य स्थापित होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों को नष्ट करना| दूसरा, भारत के बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक दोनों तरह के समुदायों में मौजूद मुठ्ठी भर कट्टरपंथियों को उकसाकर भारत के बहुधर्मीय ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सामाजिक अराजकता फैलाना|
पठानकोट के एयरबेस पर हुआ कायराना फिदायीन हमला, जिसमें हमारे सात जवानों, अधिकारियों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी, दो तरह से प्रधानमंत्री मोदी के लिए परीक्षा का समय है| पहली परीक्षा यह है कि राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री, उनकी सरकार तथा उनकी पार्टी के लिए यह स्वीकार करना कितना भी मुश्किल हो और वे इसे पूरी तरह नकार दें, पर, सामान्य से सामान्य देशवासी भी यह बता सकता है कि सरकार से और सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों, अधिकारियों से इस फिदायीन हमले का मुकाबला करने तथा उसे नाकामयाब बनाने की रणनीति बनाने तथा उसे अमल में लाने में अक्षम्य भूलें हुई हैं| ऊपर से नीचे तक सभी ने घोर अपरिपक्वता का परिचय दिया है| इसका खामियाजा फिजूल (बिना लड़े) मेस में हुईं पांच शुरुवाती मौतों के रूप उठाना पड़ा है| चाहे वह सीमा पर सीमा सुरक्षा बल की चौकसी से संबंधित गलतियाँ हों या फिर एयरबेस में इतने भारी अमले के साथ फिदायीन के घुस पाने की चूकें हों या फिर मुकाबले के लिए उपलब्ध सेना की गारद की जगह एनएसजी को लगाने की रणनीतिक भूल हो या फिर दिल्ली में बैठे मंत्रियों-अधिकारियों की मामले की गंभीरता को न समझ पाने की गलती हो, प्रधानमंत्री को सभी गलतियों को संज्ञान में लेते हुए, तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए| प्रधानमंत्री को नाराजी और असंतोष मोल लेकर भी अपने कुनबे (मंत्रीमंडल) और सलाहकारों में से उन सभी को बाहर का रास्ता दिखाना होगा, जो सरकार बनने से लेकर अभी तक अपनी अपरिपक्वता और अधकचरे ज्ञान का लगातार प्रदर्शन लगातार करते आ रहे हैं|
दूसरी परीक्षा यह है कि पठानकोट एयरबेस पर आतंकी घुसपैठ तथा उसके तुरंत बाद अफगानिस्तान में भारत के वाणिज्य दूतावास पर हुई गोलीबारी से भारत में मोदी-शरीफ मुलाकातों और पाकिस्तान के साथ रक्षा सलाहकारों व विदेश सचिव स्तर पर चल रही व होने वाली वार्ताओं पर कई कोनों से प्रश्नचिंह लगने लगे हैं| कांग्रेस का विरोधी राजनीतिक दल होने के कारण विरोध करना स्वाभाविक है किन्तु कल तक मोदी का गुणगान करने वाले चैनल, अखबार तथा स्वयं उनकी पार्टी तथा सहयोगी दलों के उनके लोग ही मुखर होकर पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार तथा किसी भी स्तर की बातचीत का विरोध कर रहे हैं, यह प्रधानमंत्री के लिए सोचनीय बिंदु है| शुक्र है कि स्वयं प्रधानमंत्री का बयान पठानकोट के बाद संयत और साधा हुआ था|
यह निश्चित रूप से विद्वेष में आने या विद्वेष फैलाने का समय नहीं है| पठानकोट जैसे आक्रमणों के बाद पाकिस्तान से बातचीत बंद करके कुछ नतीजा नहीं निकालता, यह हम देख चुके हैं| विशेषकर तब जब हमें अंतर्राष्ट्रीय या अमरीकन दबाव में पुन:-पुन: बातचीत के लिए तैयार होना पड़ता है| बातचीत बंद करके भले ही प्रधानमंत्री को लगे कि घरेलु मोर्चे पर उनकी पार्टी को कुछ सियासी बढ़त हासिल हो रही है किन्तु भारत को इससे अपने लिए सबसे ज्यादा मुश्किलात पैदा करने वाले पड़ौसी से कोई निजात नहीं मिलने वाली|
दूसरी बात, बातचीत बंद करने से पाकिस्तान की नागरिक सरकार तथा वहां की उन सियासी पार्टियों, नागरिक समूहों, संस्कृति कर्मियों, बुद्धिजीवियों, व्यापार केन्द्रों तथा शिक्षाविदों और विद्यार्थियों के समूहों को घोर निराशा तथा अवसाद से गुजरना होगा, जो भारत के साथ अच्छे संबंध के पक्ष में लगातार वातावरण बनाने में लगे रहते हैं|
दरअसल, प्रधानमंत्री ने स्वयं की तरफ से पहल करके पाकिस्तान के ऊपर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी कूटनीतिक बढ़त हासिल की है| फिदायीन पाकिस्तान की जमीन से आये हैं, इसके प्रमाण हमने पाकिस्तान को दिए हैं| उन प्रमाणों को पूरी ताकत के साथ अब अंतर्राष्ट्रीय पटल पर और विशेषकर अमेरिका के सामने भारत को रखना चाहिए| पाकिस्तान की आर्मी, जो भारत के साथ संबंधों के सामान्यीकरण के लिए पाकिस्तान की नागरिक सरकार के साथ सहमत नहीं दिखती है, से सीधी बातचीत का कोई तरीका भारत के पास नहीं है| लेकिन यह काम अमेरिका आसानी से कर सकता है| अतएव, यह समय है कि भारत अमेरिका पर दबाव बनाए कि अमरीका पाकिस्तानी आर्मी पर दबदबा कायम करके उसे आतंकवादियों की मदद करने से बाज आने के लिए कहे| इसी के साथ प्रधानमंत्री को स्वयं अपनी सरकार के मंत्रियों, सांसदों तथा अपनी पार्टी के लोगों को पाकिस्तान तथा मुस्लिमों के बारे में उलजलूल बयानबाजी करने से रोकना चाहिए ताकि घरेलु मोर्चे पर उन्हें अबाध समर्थन इस मुद्दे पर मिले|
पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद करने का मतलब, विशेषकर जब स्वयं शरीफ ने फोन पर प्रधानमंत्री से बात करके सद्भावना प्रदर्शित की है, केवल पाकी फ़ौज-आईएसआई-जिहादी गठजोड़ को ताकत पहुंचाना हो जाएगा| अब यह स्वयं प्रधानमंत्री मोदी पर है कि वह स्वयं के चुनाव प्रचार के दौरान और बहुत पहले से निर्मित घेरे से बाहर आकर, अपनी स्वयं की पाकिस्तान नीति पर कायम रहते हैं या घरेलु कट्टरपंथियों के सामने समर्पण करते हैं|

अरुण कान्त शुक्ला
8 जनवरी, 2016

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dr S Shankar Singh के द्वारा
January 14, 2016

प्रिय शुक्ल जी, सादर नमस्कार. आपका लेख तर्कपूर्ण है i. इससे असहमत तो हुआ ही नहीं जा सकता. भारत और पाकिस्तान में शांति वार्ता तो चलती ही रहनी चाहिए लेकिन मुझे लगता है कि वार्ता के सकारात्मक परिणाम निकलने मुश्किल हैं. पाकिस्तान का आधार जिन्नाह की two nation थ्योरी थी . कहने का मतलब है कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग अलग कौमें हैं जो साथ साथ नहीं रह सकती इस्लाम में अन्तर्निहित जिहाद और क़ाफ़िर का सिद्धांत हिन्दू और मुस्लिम को करीब आने में बाधक रहेंगे . फिर भी हमें आशावादी होना चाहिए और अपना प्रयत्न निरंतर जारी रखना चाहिए. इसके साथ साथ हमें अपनी सुरक्षा के प्रति भी सजग रहना होगा . यह ध्यान रखना होगा कि हम कभी गफलत में न पढ़ें और अपनी सुरक्षा के प्रति सदा जागरूक रहें. .

rameshagarwal के द्वारा
January 9, 2016

जय श्री राम अरुण कान्त जी आपला लेख बहुत विस्तृत और तथ्य पूर्ण है मोदीजी ने कोशिश की पाकिस्तान से दोस्ती करने की लेकिन इस हमले के बाद अब कोइ ऐसी लापरवाही या नम्रता दिखाई जायेगी.जो गलती हुयी उसकी जांच के बाद टीक कर दिया जायेगा देश में पाकिस्तान से ज्यादा खतरा सेक्युलर नेताओ से है सो कुर्सी के लिए मुस्लिम हिंसा को बढावा दे रहे है.देश के अन्दर दुश्मन बहुत खतरनाक होते.इस फोरम में लोगो की प्रतिक्रिया देने में इतनी मायूसी क्यों समझ से परे है?


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