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‘छोटु’ बनेगा विधि सम्मत

Posted On: 27 Jul, 2016 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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सरकार से लेकर समाज की उस गहराई तक जो हमारे घरों तक भी पहुँचती है, बच्चे और स्त्रियाँ न केवल अनदेखी का शिकार होते हैं बल्कि प्राय: प्रत्येक तरह की प्रताड़ना के लिए सभी का आसान शिकार भी रहते हैं| बीते सप्ताह राज्य सभा ने बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन ) संशोधन बिल 2016 पास कर दिया| हमारे देश के नीति निर्माताओं, राजनीतिज्ञों की सामाजिक चेतना स्त्रियों और बच्चों के प्रति कितनी सजग और सतर्क है, इसका अंदाजा इससे लग जाता है कि जब ये बिल 19 जुलाई को राज्य सभा में बहस के लिए रखा गया और पास हुआ, राज्य सभा में सदस्यों की उपस्थिति कुल सदस्यों की संख्या की 25% से भी कम थी याने 60 से भी कम|

भारत में बाल श्रम की स्थिति

यह बिल उन सभी विरोध करने वालों के मुंह पर तमाचा है, जो पिछले एक वर्ष या यूं कहें कि मई 2015 से जब मोदी मंत्रीमंडल ने इसे संसद से स्वीकृत कराने का निर्णय लिया अथवा दिसम्बर 2012 में जब पहली बार यूपीए सरकार ने लगभग वर्तमान संशोधनों वाला ही प्रारूप राज्य सभा में पेश किया था तब से इसका विरोध कर रहे थे| हमारे पास बाल श्रम को नियंत्रित करने के लिए 1986 का क़ानून था जो बच्चों को सूचीबद्ध 83 खतरनाक या जोखिम वाले उद्योगों (व्यवसायों और प्रक्रियाओं)में काम करने से निषेध करता था व अन्य व्यवसायों/प्रक्रियाओं में उसके काम करने की परिस्थितियों का नियंत्रण करता था| क़ानून के अनुसार बच्चे से अभिप्राय 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे से होता था| हम सभी जानते हैं कि इस क़ानून का कितना पालन होता था? न केवल होटलों, ढाबों, खोमचों, पान की दुकानों, साईकिल/ऑटो रिपेयरिंग दुकानों घरेलु नौकरों के रूप में हमारे आसपास ‘छोटु’ घूमते रहते थे बल्कि बीड़ी, जरीकाम, गलीचा, चमड़ा, प्लास्टिक व्यवसायों से लेकर पटाखे/विस्फोटक बनाने वाले बड़े व्यवसायों में भी कम उम्र के बच्चे लगे रहते थे|

2011 के जनसांख्यकीय आंकड़े आँखें खोलने वाले हैं| इनके अनुसार प्रत्येक 20 कामगारों में एक 5-17 वर्ष का बच्चा या किशोर है| बाल श्रमिकों की कुल संख्या लगभग 2.5 करोड़ है| इससे भी ज्यादा चौकाने वाली बात यह है कि कुल बाल श्रमिकों में से लगभग साढ़े चार लाख पांच वर्ष से भी कम उम्र के हैं| लगभग 17% बाल श्रमिक अनुसूचित जाति या जनजाति से आते हैं| कहने की जरुरत नहीं है कि कुपोषित महिलाओं, कुपोषित 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों के समान ही बाल श्रमिकों की संख्या के मामले में भी भारत दुनिया में अव्वल नंबर पर है|

संशोधन लाने के पीछे सरकार के तर्क और संशोधन

सरकारें भले ही अलग अलग गठबन्धनों की हों पर संशोधनों के पीछे के तर्क दोनों के एक से हैं| पहला तर्क है कि वर्ष 2009 में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद यह जरुरी हो गया है कि 6-14 की आयु के बच्चों के रोजगार पर लगने के प्रावधान पर रोक लगाई जाए| 1986 का क़ानून गैर जोखिम वाले व्यवसायों में इसे इजाजत देता था| दूसरा तर्क है कि 1986 का क़ानून अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रावधान 138 तथा 182 के अनुरूप नहीं था, जिसके अनुसार रोजगार में प्रवेश की न्यूनतम आयु तय करना तथा 18 वर्ष से कम आयु के किशोरों के लिए स्वास्थ्य, सुरक्षा और नैतिक रूप से नुकसानदायक व्यवसायों में लगने से रोक लगाने का प्रावधान किया जाना है| इन उद्देश्यों और मंशा को सामने रखते हुए जो संशोधन सरकार ने रखे हैं और जिनका व्यापक विरोध शुरू से किया जा रहा है, उनमें पहला है;

कोई भी बच्चा याने 14 साल से कम आयु का बालक किसी काम में नहीं लगाया जाएगा| लेकिन जब बालक अपने परिवार या परिवार के रोजगार में मदद कर रहा हो, स्कूल के बाद खाली समय में या छुट्टियों में और रोजगार खतरनाक नहीं है तो यह क़ानून लागू नहीं होगा| अगर बच्चा टी व्ही, फिल्म, विज्ञापन आदि में कलाकार के रूप में काम करता है तो क़ानून लागू नहीं होगा बशर्ते यह सब करते हुए स्कूल की पढ़ाई प्रभावित न हो| सरकार का एक तर्क यह भी है कि परिवार के व्यवसाय में काम करते हुए मालिक-मजदूर का संबंध नहीं होता है| जबकि 2009 में अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद से ही बाल श्रम मामलों में काम करने वाले व्यक्तियों, समूहों की मांग थी कि अनिवार्य शिक्षा याने 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों के किसी भी तरह के व्यवसाय में लगने पर रोक लगे ताकि अनिवार्य शिक्षा क़ानून का लाभ अधिक से अधिक बच्चे उठा सकें|

यदि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को परिवार के रोजगार में लगने की छूट दी गयी तो गरीबी और भरण-पोषण लायक कमाई बरकरार रखने के दबाव में परिवार वाले बच्चों का नाम तो स्कूल में दर्ज करा देंगे किन्तु बच्चे कभी भी स्कूल नहीं जा पायेंगे| और, ज्यादा से ज्यादा बच्चे बीड़ी बनाने, जरी, गलीचा, चमड़ा, जैसे व्यवसायों में लिप्त रहेंगे जोकि परंपरागत ढंग से कहने को तो पारिवारिक व्यवसाय हैं, पर, उन पर पूरा नियंत्रण बिचौलियों, ठेकेदारों, और बड़े व्यवसाईयों का होता है|

विशेषकर, 1991 की उदारवादी नीतियों के आने के बाद से इस तरह के सभी व्यवसाय पूरी तरह ठेके के हवाले हैं और वर्तमान सरकार उसे बढ़ावा ही दे रही है| इसके चलते ये बच्चे स्कूल से बाहर होंगे| वैसे भी शिक्षा का अधिकार क़ानून का अमलीकरण बहुत धीमा तथा कमजोर है| इस संबंध में यूनेस्को की 2015 की रिपोर्ट का तथ्य ध्यान देने योग्य है कि विश्व में लगभग 12 करोड़ 40 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं और इनका बड़ा हिस्सा याने लगभग 1 करोड़ 77 लाख, लगभग 14% भारत में ही है|

दूसरा तर्क कि पारिवारिक कारोबार में मालिक-मजदूर का रिश्ता नहीं होता है, गले उतरने वाला नहीं है| हमारे देश में बच्चों के अधिकार को सुनिश्चित करने या पालक और अभिभावकों को बालकों के अधिकारों के उल्लंघन के लिए सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है| एक दशक पहले तक हम हर जगह एक न एक छोटु पा जाते थे| बहुत मुश्किल से 5 से लेकर 10-12 तक की आयु के बच्चों को कम से कम खुले तौर पर काम पर लगाने को हम रोक पाये हैं| अब बाबूजी, चाचा, मामा की आड़ में वह गौरखधंधा फिर से खोलने का रास्ता सरकार बना रही है|

तीसरा कि पहले ऐसे व्यवसायों को छान-बीन कर सूचीबद्ध किया गया था जो या तो प्रत्यक्षत: खतरनाक थे या जहां की परिस्थितियाँ बच्चों के काम करने के लिहाज से खतरनाक थीं| यह व्यापक सूची थी और इसमें 83 व्यवसाय थे| अब सरकार इन्हें घटाकर खदान, ज्वलनशील पदार्थ और विस्फोटक उद्योग तक सीमित कर तीन पर ले आई है याने बाकी जगह उसने शोषण के लिए खुली छोड़ दी हैं|

स्थायी संसदीय समिति के सुझावों के भी खिलाफ

ऐसा लगता है कि मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप की दौड़ में लगातार फेल होती सरकार इन योजनाओं को गरीब बच्चों के कंधे पर रखकर चलाने की योजना में जुटी है तभी इन संशोधनों पर उसने न तो बच्चों के किसी समूह से बात की और न ही बाल श्रम के मामलें में काम कर रहे समूहों से कोई विमर्श किया| यहाँ तक कि उसने श्रम और रोजगार पर गठित संसद की स्थायी समिति के सुझावों को भी दरकिनार कर दिया, जिसने स्पष्ट रूप से बच्चों को स्कूल के बाद परिवार को मदद करने का प्रावधान हटाने, जोखिम वाले काम में किशोरों को स्वास्थ्य, नैतिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से नुकसानदायक व्यवसायों को शामिल करने, किशोरों को किसी भी व्यवसाय में लगने से पहले अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने, और सांसदों के उपर निरीक्षण की जिम्मेदारी सौंपने वाले प्रावधान शामिल करने कहा था|

प्रश्न बड़ा है

सरकार या वे सभी जो वर्तमान संशोधनों का यह कहकर बचाव कर रहे हैं कि ये गरीब परिवारों को राहत देने के औजार के रूप में हैं, वे इस बात को या तो जानबूझकर अनदेखा कर रहे है या सामाजिक ताने-बाने की जानकारी से बिलकुल बेखबर हैं| किसी बच्चे को उसके बचपन से कम से कम मजदूरी पर शोषित होने के लिए अभिशप्त कर देना और उसे आगे शोषित होने का प्रशिक्षण देने का काम ये संशोधन करेंगे| यह उनकी गरीबी को स्थायी रूप से उनसे चिपकाना है|

पारिवारिक व्यवसाय अनौपचारिक ढंग से चलाये जाते हैं| यहाँ काम के घंटे अनेक बार 12 से 14 घंटे तक खिंच जाते है| वहां बच्चों के अधिकारों और हितों की रक्षा कौन करेगा| थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि पालक और बच्चा दोनों स्कूल के साथ समन्वय बिठाकर चलते है तब भी स्कूल के बाद बच्चे के होम-वर्क का क्या होगा? उसके खेलने के समय का क्या होगा? उसके सोने के समय का क्या होगा? वह जो कुछ भी जो अवैधानिक है, वर्तमान सरकार उसे वैधानिक बनाने पर तुली है| यही वह श्रम कानूनों के साथ कर रही है| और यही वह बच्चों के क़ानून के साथ करने जा रही है| यदि इस क़ानून में यही संशोधन बरकरार रहते हैं और लोकसभा इसे पास करती है तो हमें फिर से अपने चारों और चाय-पान-किराना से लेकर मॉल तक की दुकानों में पटाखे से लेकर हर घरेलु उद्योग में छोटु ही छोटु देखने मिलेंगे|

अरुण कान्त शुक्ला
27/7/2016

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
August 6, 2016

तथ्यपरक, तर्कसंगत एवं विचारोत्तेजक लेख है शुक्ल जी आपका जिसमें गहरी पीड़ा छुपी है । काश यह पीड़ा नीति-नियंताओं तक पहुँच सके एवं वे वस्तुस्थिति को समझकर अनुचित निर्णय लेने से बच सकें ।


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