दबंग आवाज

मैं शव नहीं जो केवल नदी की धारा के साथ बहूं -

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aksaditya


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‘छोटु’ बनेगा विधि सम्मत

Posted On: 27 Jul, 2016  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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‘अकेलेपन’ का अहसास

Posted On: 14 Jan, 2016  
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Others कविता में

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वास्तविक ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ एक बड़ा सवाल..?

Posted On: 4 Apr, 2015  
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Others में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रिय शुक्ल जी, सादर नमस्कार. आपका लेख तर्कपूर्ण है i. इससे असहमत तो हुआ ही नहीं जा सकता. भारत और पाकिस्तान में शांति वार्ता तो चलती ही रहनी चाहिए लेकिन मुझे लगता है कि वार्ता के सकारात्मक परिणाम निकलने मुश्किल हैं. पाकिस्तान का आधार जिन्नाह की two nation थ्योरी थी . कहने का मतलब है कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग अलग कौमें हैं जो साथ साथ नहीं रह सकती इस्लाम में अन्तर्निहित जिहाद और क़ाफ़िर का सिद्धांत हिन्दू और मुस्लिम को करीब आने में बाधक रहेंगे . फिर भी हमें आशावादी होना चाहिए और अपना प्रयत्न निरंतर जारी रखना चाहिए. इसके साथ साथ हमें अपनी सुरक्षा के प्रति भी सजग रहना होगा . यह ध्यान रखना होगा कि हम कभी गफलत में न पढ़ें और अपनी सुरक्षा के प्रति सदा जागरूक रहें. .

के द्वारा:

के द्वारा: aksaditya aksaditya

के द्वारा:

के द्वारा: amarsin amarsin

आदरणीय शुक्ला जी, अपने छोटे से लेख में आपने तथ्यों की सत्यता के प्रति संदेह व्यक्त किया है | इस सन्दर्भ में सत्यता जो भी हो स्वीकार किये जाने में किसीको एतराज नहीं होना चाहिए | प्रतीकात्मक भाषा रोजमर्रा की भाषा, प्रहसन की भाषा, व्यंग की भाषा का भाव अर्थ लिया जाना ही सदा श्रेयस्कर होता है फिर भी किसी बिंदु को पकड़ कर बैठ जाना ही, यदि किसी का अभीष्ट बन गया है तो उसके लिए क्या कहा जा सकता है | इसके लिए विकल्प उपलब्ध हैं | मोदी समर्थकों को "भोकतें है, भोकते है" कहते रहना अगर आप को अच्छा लगता है तो अगला लेख "भोकते है" शीर्षक से लिखकर अपनी कुंठा को तृप्त कर सकते हैं| बहुत स्नेह प्यार के साथ आपका |

के द्वारा: Bhola nath Pal Bhola nath Pal

राष्ट्रवादी द्वारा अगर अपने देश की अपेक्षा में सब कुछ किया जा रहा है तो उससे आपका हृदय क्यों फटता है ? राष्ट्रवादी जी जो फिल्म बना रहे हैं उससे निर्माता निर्देशक, फाइनेंसर, एक्टर, दर्शक तथा प्रशंसक सभी राष्ट्र के प्रति समर्पित होने के गौरव का अहसास कर रहे हैं, तो आप इसे भोंकना कहते हैं और इसकी प्रसव पीड़ा आपको ही होती है | आप जैसे बैलगाड़ी के नीचे चलते रहते है और समय प्रति समय अपनी दुम को बैलगाड़ी में फांसकर बैलगाड़ी को रोकने की असफल चेष्टा भी करते हैं, परन्तु विकास के पथ पर अग्रसर बैलगाड़ी अपनी कायाकल्प करते बैलगाड़ी से रेलगाड़ी, रेलगाड़ी से हवागाड़ी बन कर उड़ना प्रारम्भ कर देती है | कहीं ऐसा ना हो आप की सोच अतीत का अध्याय बन जाये | पड़ाव दर पड़ाव आपका व्यंग यथार्त की खीझ में बदलता गया | क्यों ? एक लेखक को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए | अंततः देर आये दुरुस्त आये | सांप को भी बिल में सीधे ही घुसना पड़ता है | मजबूर हुआ आपको आप के अनुरूप आदर सत्कार देने के लिए, इसके लिए मैं स्वंय को गौरवान्वित समझता हूँ | आप बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक हैं | रावण भी ६४ युग बेस्ट ब्लॉगर रहा था, पर था रावण ही | ................................................................................................................................................ वे दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं, मुझे फक्र है, हूँ तो किसी की निगाह में | (आप की सांत्वना, सकूँ के लिए ) सप्रेम आपका.............

के द्वारा: Bhola nath Pal Bhola nath Pal

आदरणीय अरुण कान्त शुक्ला जी ! सादर अभिनन्दन ! आपने लीक से अलग हटकर लिखने की कोशिश की है ! परन्तु आपकी ये कोशिश उन करोड़ों भारतवासियों का अपमान है,जिन्होंने मोदी जी को बहुमत प्रदान किया है ! आप इस बहुमत की सरकार का मखौल उड़ा रहे हैं और तीस साल से चल रही अल्पमत की सरकारों की तारीफ कर रहे हैं ! आपके लेखक के निष्पक्ष होने के धर्म को नहीं निभाया है और पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर ऐसा लेख लिखा है,जिसे पढ़ने के बाद महसूस होता है कि लेख को पढ़कर हमने अपना कीमती समय बर्बाद किया ! ऐसा लगता है कि जागरण जंक्शन मंच के द्वारा 'बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक' का चुनाव हड़बड़ी में कई बार लॉटरी सिस्टम से बिना पढ़े ही बहुत विचित्र ढंग से कर लिया जाता है ! फिर भी आपको बधाई और हमें हंसाने के लिए हार्दिक आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: aksaditya aksaditya

शुक्ल जी आपने सही कहा है उसके लिए साधुवाद ! सवाल यह नहीं है मोदी जी क्या सही कह रहे है क्या सही नहीं कह रहे है सवाल यह है कि वह आज जो कुछ भी कह रहे है उस पर सवाल कौन खड़े कर सकता है - अभी हमने एक समाचार देखा था जिसमे कुछ लोग दो मुंह के सांपो को तश्करी के लिए लाये थे जिनकी कीमत करोडो में आंकी गई थी हम आज दो मुंह से बात करने वाले नेताओं की फ़ौज दिल्ली और प्रदेश कि राजधानियों में देखते है इनकी कीमतों का अंदाज तो हमें नहीं है लेकिन उनको दो मुंह होने से उनकी कीमत करोडो से भी ऊपर आंकी जा सकती है - क्योंकि नरेंद्र भाई मोदी जब बात करते है तो सारे इतिहास भूगोल को ही झुटला देते है - अब यह तो उनके ज्ञान वान होने का सबूत है या अल्पज्ञानी होने का यह बात तो उनके फालोअर्स पर निर्भर करती है हम तो समझ ससकते है वह समझ सकते है - ??

के द्वारा:

के द्वारा: Bhola nath Pal Bhola nath Pal

आदरणीय शुक्ल जी, सादर अभिवादन! मैं आपका यह आलेख बहुत पहले पढ़ चूका हूँ, प्रतिक्रिया देर से देने के लिए क्षमा चाहता हूँ. इसमें दो राय नहीं की मोदी जी वाक्पटु हैं और परिस्थिति के अनुसार शब्दों का का प्रयोग भी करते हैं. काफी कुछ परिस्थितियां बदल रही है. मोदी का नेतृत्व निश्चित ही बदलाव का संकेत है. राजनाथ सिंह और सदानंद देवगौड़ा के पुत्र को भी न बक्शा जाना उदाहरण है. दिल्ली में अब जोड़तोड़कर सरकार बनाने से इंकार करना यह बतलाता है की मोदी जी दाग से बचना चाहते हैं. वैसे केजरीवाल को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए जैसा किइनके अंध समर्थक कर रहे हैं. केजरीवाल के पास समर्पित कार्यकर्ताओं का अभाव है. वहां भी स्वार्थ से भरे लोग हैं इसलिए यह पार्टी बीच बीच में विवादों में आ जाती है. पर केजरीवाल और आप पार्टी की उपस्थिति निंदक नियरे की तरह रहना जरूरी है नहीं तो इनके अंध भक्त निरंकुश हो ही जायेंगे. आपका यह सार गर्भित लेख कई दिनों से एक नंबर में है यह भी इसकी सार्थकता को बयान कर रहा है. सादर आभार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय अरुण कान्त शुक्ल जी मुझे आज पहली बार आपके विचारों एवं लेखन के अंदाज से रूबरू होने का अवसर मिला है| वैसे तो मैं आप की बात से सहमत हूँ कि निरे अंध भक्त तो किसी व्यक्ति के पतन के ही जिम्मेदार हो सकते हैं| गोस्वामी तुलसी दास जी का ये दोहा ' सचिव वैद गुर तीन जौं प्रिय बोलहिं भय आस | राज धर्म तन तीनि का होइ बेगहिं नास || अंधभक्तों के लिए ही कहा गया है| आपके अनुसार मोदी जी के भक्तों अथवा समर्थकों को इस बात का ज्ञान होना ही चाहिए अन्यथा वे किसी तरह के लाभ कि बजाये नुक्सान ही पहुंचाएंगे| जहाँ तक मैं समझता हूँ मोदी जी स्वयं तो इस बात को भली भांति समझते होंगें कि " निंदक नेरे राखिये........" निंदक कहो या सच्चा आलोचक मनुष्य को निर्मल करने का ही काम करता है | हो सकता है जापान वाली वो घटना एक आधी जगह पर सत्य भी हो, सभी जगह इसे लागू कर पाना संभव नहीं ये तो तभी लग गया था जब ही ये वक्तव्य उन्होंने दिया था| कभी कभी अर्धसत्यों का सहारा लिया भी जाता है राजनीति में| परन्तु जागरूक सामाज को निपट अंधविश्वासी नहीं होना चाहिए, अपने शीर्षकर्णधारों को भी आइना दिखलाने का साहस होना ही चाहिए ताकि वे राह न भटक जाएँ| आपका प्रयास बिलकुल सही है| आपको बहुत बहुत साधुवाद|

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta

के द्वारा: jlsingh jlsingh

यह आज की सच्चाई है कि भारत ने अपने सभी पड़ौसी देशों के मध्य अपनी रणनीतिक हैसियत खोई है| यह गुटनिरपेक्ष नीति से भटकाव का ही परिणाम है कि भारत अपने पड़ौसी देशों के नेता होने के रुआब को भी खोता गया है। विडंबना यह है कि एनडीए के बाद आई कांग्रेस ने भी गुटनिरपेक्ष नीति को पुष्ट करने के बजाय अमेरिका के पिछलग्गू होने की नीतियों को ही बढ़ावा दिया, जिसका परिणाम लम्बे समय में देश की आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है। कांग्रेस के इस कदम की वजह से पड़ोसियों से हमारे ताल्लुकात बिलकुल खत्म जैसे ही हो गए थे लेकिन आज भी हालात बहुत नही सुधरे लेकिन फिर भी एक उम्मीद जगी है ! बेहतरीन आलेख , बधाई आपको

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा:

आपकी यह बात सही है की आतंकवाद को राजनीतिक उदेश्यों की पूर्ती के लिए बढ़ावा दिया जाता है. यह भी सही है की आतंकवाद गरीबी, भुखमरी , गैरबराबरी के कारण पनपता है. लेकिन एक बात जो मेर समझ के बाहर है यह यह है की गरीबों, आदिवासियों, इसनों की हत्या करके, स्कूलों, बिजलीघरों, पुलों, अस्पतालों को बम से उड़ाकर , किस प्रकार इन समस्याओं का समाधान हो जायगा मेरी अमझ में आतंकवाद इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत नहीं करता है. अपनी सभी कमियों के बाावजूद लोकतंत्र एक बेहतर व्यवस्था है. आतंकवाद के अन्य कारणों में है जिहाद जो सारे दुनिया को आतंक के द्वारा मुसलमान बनाना चाहता है. इससे सारी दुनिया त्रस्त है. आप अनभिज्ञ नहीं होंगे. बाकी आप स्वयं समझदार हैं.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

के द्वारा:

शुक्ला जी मैं आपके विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ और आपको सप्ताह के बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर हार्दिक बधाई देता हूँ मेरे विचार से भी सारी फसाद का जड़ देश में आर्थिक विसमता ही है और देश के संसाधनों पर कुछ प्रतिशत लोगों का कब्ज़ा ही नक्सलवाद एवं उग्रवाद की जननी है जब तक नेता लोग इस पर गंभीरता से विचार नहीं करेंगे और राजनीती को लोकनीति ,जननीति नहीं समझेंगे केवल सरकार बनाने ,चुनाव कराने और कागजी योजनाएं बनाने में लगे रहेंगे तब तक किसी विकास का कोई मतलब नहीं रहेगा गांधी जी के शब्दों में "जब तक देश के गरीब से गरीब तक विकास की किरण नहीं पहुंचेगी प्रजातंत्र बेमानी है सरकार बेमानी है लोकतंत्र बेमानी है ,विकास बेमानी है "

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

मोदी को पिछलग्गू बोलने वाले जरा अपने गिरेबां में झाँक लें कि कौन किसका पिछलग्गू है। भीख और फेंकी हुई हड्डियों पर पलने वाले सियारों को शायद मोदी का अंदाज पसंद नहीं आ रहा है। कभी कम्युनिस्ट पार्टियों ने चीन के विरुद्ध एक शब्द भी कहा है ? भटकाव और उलझाव के शब्दों से खेलना किसी को सीखना हो तो कम्युनिस्टों से सीखे कारगिल की लड़ाई कैसे रुकी ये सारी दुनिया जानती है, लेकिन लेखक हद दर्जे की धूर्तता को दिखाते हुए जांबाज भारतीय सैनिकों के अप्रतिम बलिदान को झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान जैसे धूर्तों से निपटने की लिए अब सख्त क़दमों की आवश्यकता है ना की प्यार की भाषा की। ६० साल प्यार की भाषा ही बोलते आए और क्या उखाड़ लिए ? सांप को दूध नही लाठी की भाषा समझाने की जरूरत है। सतही राजनीति के बजाए अब ठोक पीट की राजनीति की जरूरत है और मोदी बिलकुल सधे अंदाज में ठीक ढंग कर रहे हैं और यही कांग्रेस और पिछले दरवाजे से राज करने वाले कम्युनिस्टों को हजम नहीं हो रही है और ये लेख उसी का परिणाम है।

के द्वारा:

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---- लेखक ने लिखा है कि....भारत जैसे विडंबनाओं वाले देश में जहां पुरातनपंथी ढंग से महिलाओं को देवी बनाकर पूजनीय तो बताया जाता है, पर व्यवहार में इसके ठीक उलट होता है, महिला सशक्तिकरण की स्थिति दयनीय ही हो सकती है| वर्ष 2003 में जारी वर्ल्ड इकानामिक फ़ोरम की ग्लोबल जेंडर गेप रिपोर्ट में भारत का स्थान 136 देशों में 101वां था|...... ----एक दम घिसा पिटा आलेख है .....कुछ भी नया नहीं है ....लेखक कुछ विदेशी एवं अंग्रेज़ी लेखकों की भारत-विरोधी बातों से भ्रमित है ...... --- भारत क्यों विडंबनाओं का देश है ...क्या लेखक समझाएगा ..इन वर्ल्ड फोरम्स की बात की कोइ भी कीमत नहीं है ये सभी भारत की हर बात व तथ्य को गलत सिद्ध करने में मगशूल रहते हैं ...बिना किसी तर्क के ----देश की बुराई करके आलेख लिखना आज फैशन होगया है.....

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वे अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैं| कभी राष्ट्रवाद का नकाब ओढ़कर, कभी मजहब का परचम लेकर, कभी हिंदुत्व के नाम पर तो कभी जिहाद के नाम पर| इनमें आपस में सांठ-गाँठ है| उनके अपने प्रयोजन हैं| उन्हें सत्ता चाहिए| उन्हें शक्ति चाहिए| उन्हें संपत्ति चाहिए| इसके लिए समाज के बहुसंख्यक हिस्से का दलित और वंचित बने रहना जरुरी है| धर्म इनके लिए उस हिस्से को शोषित करने का हथियार है| आदरणीय शुक्ल जी, सादर अभिवादन! बहुत ही सुन्दर ढंग से विवेचना की है आपने ... हमें विवेकवान होकर कर्म करने की जरूरत है, किसी अज्ञात चमत्कार की उम्मीद में आदमी ऐसे ही धोखा खाता है ... पर हम सीख कहाँ लेते हैं जब अपने ऊपर गुजरती है तब तक सब कुछ ख़त्म हो गया रहता है ... खैर आशाराम तो जेल में हैं ही उनके आश्रम पर भी बुलडोजर चलने लगे हैं ...तथाकथित हिंदूवादी ताकतें अभी खामोश है ....मुजफ्फरनगर और मोदी में मशगूल हैं.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा:

आपने सही लिखा है " पूरे समय सरकार और पोलिस को कोसते रहना भी कुछ लोगों का शगल हो सकता है| पर, इन शगलों से जिन्दगी नहीं चलती|" कम से कम बाइकर्स वाले मसले में तो उन्हें दोषी करार नहीं ठहराया जा सकता है। आजकल् सड़कार पैदल चलना सड़क पार करना दूभर हो गया है।धनाड्य ही नहीं सामान्य स्तर के बच्चों में भी यही प्रवृत्ति अधिकतर देखी जा रही है। माता पिता ही बच्चे के प्रथम शिक्षक हैं। उचित अनुचित की सीख, एकदूसरे की सहायता, सच झूठ की परख, अच्छा आचरण, बड़ों का आदर सम्मान, छोटों को प्यार्, गरीबों की सहायता आदि बच्चे गुण बच्चे माता पिता से ही तो सीखते हैं। सरकार का ही नहीं बल्कि समाज का भी कर्तव्य गलत कामों है को बढ़ावा न दें।आशा है कि आप जैसी सोच यदि अधिकांश लोगों की हो तो काफी हद बच्चों को बचपन से ही गलत काम से रोका जा सकता है

के द्वारा:

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

सत्ता के गाने , गाना पुरानी परंपरा रही है ! और इसमे नाम / पुरस्कार पद क्या कुछ नही मिलता / पर माँ सरस्वती के सच्चे सपूत कभी कला गोरा नही देखते | इंदिरा गाँधी की मौत के बाद दिल्ही दंगो का जिक्र आज कोई नही करता ? गोदरा मे मरे हिन्दू शायद मानव ही नही थे ? सिर पर तसला रख कर चलते / गरीब की रोटी खाते राहुल ? हर चोराहेपर अंबेडकर की मुर्तिया / लोहिया के नाम पर बन्श्बाद की बेल / आजीवन कुयारियो के अरब पति रिश्ते दार कालाचश्मे मे परिवार को लूट की छुट देते लोग | कितने कांग्रेस के लोग गाँधी जी की शिक्षा पर है ? मोदी भय के चलते ........ वेसे तो लोकतंत्र है पर मोदी को आने से रोकने को सब कुछ कर डालो क्या ये सही है ! कभी ऊपर दिए गए विषयो पर लिख कर देखे ??? कितने पुरुस्कार मिलते है ?

के द्वारा: aman kumar aman kumar

क्योंकि मृत व्यक्ति कभी बोलते नहीं हैं, सरदार पटेल कभी भी ज़िंदा होकर मोदी के प्रेम का भंडाफोड़ करने नहीं आ सकते। लेकिन, वे दस्तावेज अभी भी जिन्दा हैं, जो बताते हैं कि मोदी का सरदार पटेल के लिए प्रेम देशवासियों को छलने की एक चाल के सिवा कुछ नहीं है। सरदार पटेल की संघ और हिन्दु महासभा के बारे में ये समझ तब भी थी, जब उन्होंने संघ के ऊपर पहला प्रतिबन्ध लगाया था. यह बात सरदार पटेल के 11 सितम्बर और 18 जुलाई 1948 को लिखे पत्रों से भी जाहिर होती है, जो उन्होंने संघ के तत्कालीन प्रमुख गोलवरकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखे थे। आदरणीय श्री शुक्ला जी सादर ! लेखन बहुत संतुलित और सटीक है ! लेकिन कुछ सवाल मन में आते हैं ! इज़ाज़त हो तो बयान करूँ ? यही बात -हर गली और हर चौराहे पर लगी नेहरु , इंदिरा और राजीव गाँधी की मूर्तियों पर भी क्यूँ नहीं लागू होती जो चीज आपने उठाई हैं ? यही बात हर उस भवन के लिए क्यूँ नहीं लागु होती जिसका नाम सिर्फ और सिर्फ नेहरु और गाँधी परिवार के लोगों के नाम पर हैं ? जागरण ने आपके लेखन को सही पुरस्कार दिया है ! आपको बहुत बहुत बधाई

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय शुक्ला जी सप्ताह बेस्ट ब्लागर बनने पर आपको हार्दिक बधाई, अब ये तो इतिहास की बात है कि श्री पटेल भारत माँ के एक सच्चे सप थे और उनको कोई भी भारतीय अपना आदर्श बना सकता है परन्तु अगर भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांत हीन प्रोजेक्टेड नेता केवल राजनितिक फायदे के लिए सरदार पटेल के मुद्दे से देश की जनता को उद्द्वेलित करना का ख़्वाब देख रहे है तो यह उनकी भूल ही होगा - वैसे भी यह चाल भारतीय जनता पार्टी का मातृव संघठन आर एस एस जो अपने ककून में रह कर (ककून एक कार का खोल होता है जिसमे रह कर रेशम का कीड़ा रेशम बुनता है ) - जाल बुनने का कार्य करता है यह उसकी ही चाल है उसी की है ? क्योंकि जैसा आपने भी लिखा है" सरदार पटेल लगभग 1917 से लेकर मृत्यु (1950) तक कांग्रेस में रहे और कांग्रेस में रहते हुए ही उन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और अनेक वर्ष अंग्रेजों की जेल में गुजारे। जबकि, उस समय की हिन्दुमहासभा या संघ के किसी भी नेता के आजादी के किसी भी प्रमुख आन्दोलन में हिस्सा लेने का कोई इतिहास नहीं है।" इससे यह तो सिद्ध ही होता है को महिमामंडित करने के लिए अपने पास कुछ नहीं है तो गैरों से काम चला लो तो क्या हर्ज है

के द्वारा:

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम अद्भुत जानकारियों से भरा लेख वाकई दिलचस्प लगा ,......यदि किसी भी वजह से राष्ट्र के किसानों में एकजुटता आती है तो यह स्वागतयोग्य है ,.....लेख निःसंदेह एकपक्षीय है ,.... परिस्थितिजन्य रिकार्ड आपको उपलब्ध हुए और संघ या हिन्दू महासभा का आजादी में किंचित योगदान नहीं मिला यह अद्भुत ही है ,.....माँ भारती के वीर सपूत वीर सावरकर की कठोर सजा को आप क्या कहेंगे !!.......पटेल जी का कांग्रेस में रहना राष्ट्र का दुर्भाग्य मानता हूँ ,....पंद्रह में से चौदह मत पाकर भी वो प्रधानमंत्री नहीं बन सके ,...यही कांग्रेसी असलियत है ,......मोहनदास गांधी की हत्या के समय की परिस्थिति का अवलोकन भी आवश्यक लगा ,...राष्ट्र के रक्तिम टुकड़े भी हुए थे ,.... डोमिनियन स्टेट का अर्थ शायद अधीन राज्य ही होता होगा .....कांग्रेस के साथ पटेल जी का रहना कोई मजबूरी हो सकता है ,..वैसे बुद्ध भी विष खाने को मजबूर हुए थे ,....भीष्म,क्रिपाचार्य ,द्रोण भी पांडवों से लड़ने को मजबूर हुए थे ,....गांधी से बड़ा पाखण्ड इस देश में आज तक नहीं हुआ ,... तभी आम धारणा है मजबूरी का नाम महात्मा गांधी !!...........मोदी राजनैतिक संत हैं ....अंग्रेजों से मूरख बना देश इस बार लुटेरों पर उनकी विजय देखना चाहता है ,........देश के किसान हंसिया दराती निकाल चुके हैं ....चाल तो सभी चलते हैं ,...कोई कुटिल ..कोई साफगोई से !.....सादर

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आदरणीय शुक्ल जी, सादर नमस्कार| मोदी जी का गाँव के किसानों से औज़ार माँगना "चाल" की श्रेणी में किस प्रकार आ गया ये सोच-सोचकर हम हैरान हैं| इसे यदि आपने प्रचार का माध्यम बताया होता तो बात कुछ समझ आती| इसके अतिरिक्त आपने हिन्दू महासभा को भाजपा की पित्र-संस्था बताया है किन्तु आप यह भूल गए की हिन्दू महासभा आज भी स्वतंत्र रूप में अस्तित्व में है और स्वाधीनता-पूर्व काल में भी हिन्दू महासभा का संघ से कोई लेना-देना नहीं रहा है| यह मात्र संयोग ही है की जनसंघ के गठन से पूर्व डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिन्दू महासभा के सदस्य थे| और जहाँ तक संघ अथवा हिन्दू महासभा के स्वतन्त्रता संग्राम में हिस्सा लेने की बात है, तो आश्चर्य है की आपने स्वातंत्र्य-वीर विनायक दामोदर सावरकर और डा. हेडगेवार के विषय में अभी तक कुछ जाना ही नहीं|  इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की जब राहुल गांधी मंच से कहते हैं की मेरी माँ मेरे कमरे में आ कर रोई या फिर जब वो किसी किसान के घर खाना खाने की ड्रामेबाजी करते हैं तो उसमें आपको चाल नहीं दिखती किन्तु मोदी जी यदि किसानों से औजर मांगते हैं तो वहाँ आप संघ की साजिश तलाशते हैं|

के द्वारा: जीत कौशल जीत कौशल

बहुत सटीक बात कही है श्रद्धेय शुक्ल जी । अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीतिक स्तर पर इस भ्रष्ट सरकार ने देश को गरीब की जोरू गाँव भर की भौजाई बनाकर रख दिया है । जितना हो सके हर स्तर पर देश को नोचकर अपनी तिज़ोरी में भरने वाली मानसिकता इनकी एकमात्र उपलब्धि है, जिसमें ये आदमखोर शेर जैसे खूंखार दिखते हैं । देशहित से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तो ये हर जगह भीगी बिल्ली ही नज़र आते हैं, पाकिस्तान हो, या इटली । हो न हो इस प्रकरण को एक ड्रामे के तौर पर प्लांट किया गया हो, जिसकी आड़ में चाँपर घोटाले की आँच को मद्धिम किया जा सके, या इटली को एक बहाना दिया जा सके, जिसकी सहायता से जाँच में उसका असहयोग थोड़ा स्वाभाविक सा दिखे । अच्छी पोस्ट की बधाई ।

के द्वारा:

सामाजिक जीवन के लगभग प्रत्येक पहलू को बाजार के हवाले करते जाने का नतीजा यह हो रहा है कि बड़े बड़े कारपोरेट्स और कंपनियां ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को अपने उत्पादों की तरफ खींचने की होड़ में कुत्सित विज्ञापनों का सहारा लेकर लोगों की रुची और प्रवृति दोनों को ही बिगाड़ने पर तुल गए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में माल बेचने के लिए धूर्तता पूर्वक महिलाओं को वस्तु के रूप में पेश/इस्तेमाल किया जा रहा है। बाजार की महिलाओं के साथ यह दोहरी संबद्धता, माल बेचने के लिए महिलाओं का वस्तु के रूप में इस्तेमाल और माल की खपत के लिए तैयार खड़ा विशाल बाजार, एक ऐसी परिस्थिति और प्रक्रिया को निर्मित करता है, जहां स्वयं महिलाएं भी अधिकाधिक आय अर्जन की लालच में स्वयं के वस्तुकरण के लिए लालायित हो जाती हैं। मीडिया भी चूंकि उसी बाजार का एक अस्त्र है, वो भी सौन्दर्य स्पर्धाओं, फेशन परेडों, सफल माडलों की कहानियों जैसे कार्यक्रमों के जरिये समाज में कुत्सित अभिरुचियों को बढ़ाने में लगा रहता है। इस कार्य में अधेड़ और वृद्ध महिलाओं को भी वस्तु के रूप में पेश करने में बाजार को कोई हिचक नहीं होती, क्योंकि बाजार के लिए वे वस्तु और खरीददार दोनों होती हैं।बिलकुल सही ! बढ़िया पोस्ट

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

गांधी बोलता था की पहले गरीब को खाना मिलना चाहिए फिर अमीर के खाने की चिंता करनी चाहिए। आपकी सरकार पहले अमीर की चिंता करती है फिर गरीब की बात करती है। गांधी बोलता था पाप से घृणा करो पापी से नहीं। आपकी सरकार पापी और पाप दोनों से प्यार करती है। गांधी रोज शाम को प्रार्थना सभा में कुछ न कुछ बोलता था। आपकी पार्टी के प्रधानमंत्री और आपकी माँ जहां बोलना चाहिए , वहां भी चुप रहते हैं। आप बोले की गांधी हर तबके के लोगों को प्रेरित किया । पर, अपुन को ऐसा नहीं लगता। यदि गांधी सबको प्रभावित किया होता तो सबसे ज्यादा तो कांग्रेसी प्रभावित होने चाहिए थे, पर, आपको लगता है ! आपके सुर में सुर मिलाता है अपुन भी श्री आदित्य जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

श्रद्धेय शुक्ल जी, मैं आपके प्रयासों से सहमत हूँ, और उनका प्रशंसक भी । यह भी जानता हूँ कि वैचारिक धरातल पर आपका संघर्ष मात्र व्यवस्था से ही नहीं, बल्कि अपने ही कुनबे के दिग्गज़ नेताओं से भी अक्सर चलता ही रहता है । जाहिर है कि आप ईमानदार बदलावों के पक्षधर रहे हैं और निरन्तर संघर्षशील भी । मेरी असहमति इस मोर्चे पर है, कि आज ट्रेड यूनियनों सहित हर ज़िम्मेदार राष्ट्रवादी की प्रथम प्रतिबद्धता देशहित के प्रति होनी चाहिये, न कि अपनी-अपनी हठधर्मिताओं के सापेक्ष । अनुमानत: इन दो दिनों में सकल घरेलू उत्पाद के बहुमूल्य 20 हज़ार करोड़ रुपए के लगभग का नुकसान उस हड़ताल के कारण होने वाला है, जिसे आप खुद अपनी उपरोक्त टिप्पणी में अनुत्पादक मान रहे हैं । आज पूर्व की भाँति न तो हस्तचालित मिलों का ज़माना रह गया है, और न ही कोई असंगठित मजदूर-वर्ग ही वज़ूद में है, जिसे संगठित कर उसकी मांगें मनवाने की कवायद की जानी आवश्यक प्रतीत होती हो । 75 प्रतिशत से अधिक उत्पादन आउटसोर्सिंग के ज़रिये हो रहा है, जिसके श्रमिक किसी एक सीमा में रहते भी नहीं हैं । सारा परिदृश्य बदल चुका है । इस हड़ताल में अकेले बैंकिंग सेक्टर के शामिल होने से ही नुकसान का प्रतिशत सीधे-सीधे दोगुना होने जा रहा है, जबकि आपकी सूची से जुड़ी मांगों से बैंकिंग सेक्टर का कोई लेना देना है ही नहीं । बैंक मात्र अपनी यूनियनों के प्रति एकता प्रदर्शित करने हेतु इस हड़ताल में शामिल हैं । यह दबाव नहीं बल्कि सीधे-सीधे ब्लैकमेलिंग है, जिसका शिकार खुद अपने ही देश के आम नागरिक और उनसे जुड़े राष्ट्रव्यापी हितों के अतिरिक्त कोई और नहीं होने वाला है । आप जानते ही हैं कि आज लगभग सभी राजनीतिक दलों के अपने-अपने अलग ट्रेड यूनियन हैं, जिनके समस्त क्रियाकलाप अपनी पार्टी-विशेष के हितों के लिये ही प्रमुख रूप से संचालित होते हैं । नाटकबाज़ी इसलिये कहा, क्योंकि यदि संघीय सरकार से सचमुच शिकायत है, और सारे उसकी नीतियों के धुर विरोधी ही हैं, तो फ़िर उसे गिराकर लोककल्याणकारी सरकार का गठन करने के प्रयासों को झटका देते हुए बार-बार इन यूनियनों से जुड़े राजनीतिक दल एकजुट होकर इसी लोकविरोधी सरकार को सपोर्ट क्यों कर जाते हैं ? गिर क्यों नहीं जाने देते, ताक़ि एक बार में ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे इन राक्षसों का खात्मा हो जाय ? इससे आखिर क्या सिद्ध होता है, अब आप ही फ़ैसला करें । यदि आप आम चुनावों पर आने वाले गैर-ज़रूरी खर्चों से देश को बचाने के लिये इस सरकार को बचाने हेतु खड़े हो जाते हैं, तो फ़िर आम हड़ताल के कारण लगने वाली 20 हज़ार करोड़ की चपत का कोई दर्द यूनियनों को क्यों नहीं महसूस होना चाहिये ? वीवीआईपी चाँपर सौदे में किसी कथित परिवार-विशेष को दो सौ करोड़ रुपए का नज़राना इतालवी कम्पनी द्वारा दिया गया है । इस पर अभी तक एक राजनीतिक पार्टी के अतिरिक्त किसी ने भी कोई बयान तक ज़ारी नहीं किया । जब सभी का लक्ष्य मात्र अपनी भारतमाता को ही निरन्तर चोट पहुँचाने का रह गया है, तो फ़िर कुछ भी कहना अरण्य-रोदन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

आदरनीय शाहीजी ..आपका कथन एकदम ठीक है की ट्रेड युनियन के आन्दोलन के तौर तरीकों में भी बदलाव होना चाहिए औए मैं इसकी कोशिश भी अतीत में भरसक करता रहा हूँ | पर, मैं इससे सहमत नहीं हूँ की ये एक नाटकबाजी है | दरअसल , जितना नुकसान देश की सरकारें कर रही हैं, फिर चाहे वह केंद्र की हो या राज्य की, उतना नुकसान तो सौ दिन का बंद भी नहीं कर सकता, फर्क सिर्फ किसका नुकसान हो रहा है, उसका है? सरकारें गरीबों का नुकसान कर रही हैं और हड़ताल अमीरों के मुनाफे को दो दिन सिर्फ शिफ्ट करेगा| आज पूरी दुनिया में इन नीतियों को वापस लेने की मांग हो रही है| यह आन्दोलन भी उसी का एक हिस्सा है| यह सब को मालूम है की इस हड़ताल से कुछ होने जाने का नहीं है, पर, यह भविष्य का प्लेटफार्म है, जिस पर आम आवाम आगे की लड़ाई को लडेगा और जीतेगा भी| यदि हम सिर्फ आज को देखेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी | आज की सारी जीतें, सारे युगों में अतीत के संघर्षों पर ही कामयाब हुई हैं| आशा है, आप मेरे आशय को समझेंगे|

के द्वारा:

इस संघर्ष को कभी बन्द होना भी नहीं चाहिये श्रद्धेय शुक्ल जी, परन्तु क्षमा करेंगे, संघर्ष के तरीक़ों में भी अब बदलाव लाना लाज़मी हो गया है । ट्रेड यूनियनें अगर संघर्ष के तौर-तरीक़ों को भी ट्रेडीशनल ही रखना चाहती हैं, तो कहना होगा कि उन्हें आज की ज़रूरतों का इल्म नहीं है, या फ़िर इधर से आँखें बन्द कर उनका मक़सद मात्र खुद को भूलते आधुनिक समाज़ को अपने अस्तित्व का बोध कराना भर है । कांग्रेस अथवा यूपीए सरकार से तो वैसे भी सारा समाज बेज़ार हो चला है, और अपनी बदहाली पर ज़ार-ज़ार रोने के बावज़ूद उसके आँसू किसी मुकाम पर भी सूखने का नाम ही नहीं ले रहे । आखिर यह बेहया सरकार किसके बलबूते पर रोज़ बा रोज़ नए-नए झटके उन मजदूरों, किसानों और आमजन को देती चली जा रही है, जिसकी लड़ाई का बीड़ा उठाकर ट्रेड यूनियनें पूरे दो दिनों तक देश की रोज़मर्रा की स्वाभाविक गति पर ब्रेक लगाने हेतु कटिबद्ध हैं ? क्या इन ट्रेड यूनियनों में ऐसा कोई घटक राजनीतिक दल न होने का दावा आप कर पाएंगे, जिसने इस सरकार के विरुद्ध उठाए गए विगत अ-विश्वास प्रस्तावों के समय उसकी ढाल बन कर रक्षा करने का पुण्य कार्य न किया हो ? मुझे नहीं लगता कि आप ऐसा कोई दावा कर पाने में सक्षम होंगे । इनके द्वारा आहूत आम हड़ताल जैसे पुनीत कृत्य का परिणाम क्या होगा ? यही न, कि वो दिहाड़ी मजदूर, जिनके कल्याणार्थ हड़ताल कराई जा रही है, अगले दो दिनों तक उस काम से वंचित रहेंगे, जिसकी वजह से उनके घर का चूल्हा जलता है । आमजन में से पता नहीं किस-किस के कौन-कौन से वह पूर्व-निर्धारित कार्य छूटेंगे, जिनसे शायद उनका आने वाला लम्बा समय प्रभावित हो जाने वाला है । हो सकता है फ़िलवक़्त चिदम्बरम जी जैसे क़द्दावर सरकारी प्रतिनिधिगण के साथ किसी फ़ाइव-स्टार होटल में ट्रेड यूनियन से जुड़े बड़े नेतागण की बड़ी खास मीटिंग चल रही हो, परन्तु मुझे नहीं लगता कि इस मीटिंग का अब कोई खास नतीज़ा भी निकलने वाला है । इनकी मीटिंग्स अन्ना और रामदेव जी के साथ भी हुई थी, हश्र सबको पता है । ये या तो खरीद लेंगे, या फ़िर लाठियाँ भाँजने की व्यवस्था कर टरका देंगे । देंगे कुछ नहीं । इनके लेने से कुछ बचेगा तब तो देंगे ! मैं सिर्फ़ ये कहना चाहता हूँ कि आज इनके संघर्ष का तरीक़ा जंतर-मंतर या रामलीला मैदान आदि में धरना प्रदर्शन आदि के माध्यम से दबाव बनाने का होना चाहिये, क्योंकि दो दिनों तक देश का चक्का जाम रखने जैसे राष्ट्रव्यापी नुकसान से जनता का कोई भला नहीं होने वाला है । हड़ताल बे-मियादी होती, तो भी कुछ समझ में आता कि इस पार, या फ़िर उस पार । यह हड़ताल तो खुद के द्वारा समर्थित सरकार के साथ साँठ-गाँठ पूर्वक की गई नाटकबाज़ी से अधिक कुछ प्रतीत नहीं ही हो रही है ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: Prashant Singh Prashant Singh

इस कामुक समाज का प्रत्येक अंग, व्यक्ति से लेकर संस्था तक, राजनीति से लेकर धर्म तक, स्त्री से लेकर पुरुष तक, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक की घटनाओं पर, दहेज से लेकर डायन/टोनही कहकर महिलाओं को मार देने तक की घटनाओं पर, प्रेम निवेदन अस्वीकार कर देने से सम्मान के लिए स्त्रियों को मार देने तक की घटनाओं पर, उसी कामुक नजरिये से सोचता है। यही सोच पोलिस को लापरवाह बनाती है। यही सोच 100 में से 70 बलात्कार के अपराधियों को न्यायालय से छुड़ाती है। यही सोच बलात्कारियों को लोकसभा और विधान सभाओं में पहुंचाती है। आपने जो शीर्षक लिया है वो बिलकुल सटीक और सार्थक लगता है ! जिस देश में औरत के विभिन्न रूपों की पूजा होती है वाही औरत इस देश में सबसे ज्यादा अत्याचार सहन करती है ! बहुत सुन्दर , विषयपरक लेखन श्री आदित्य जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आपने अमेरिका के पाखण्ड की पोल खोल कर बड़ा ही सराहनीय कार्य किया है. अमेरिका अपने यहाँ तो खुदरा क्षेत्र को मजबूत करना चाहता है, लेकिन हमारे यहाँ वह चाहता है कि. खुदरा क्षेत्र को बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले किया जाय. इसमें अमेरिका का निहित स्वार्थ है. छोटे व्यवसायों को समर्थन देने से उनके लोगों को नौकरी मिलेगी और बेरोजगारी पर नियंत्रण करने में सहायता मिलेगी. आपके इस कथन से मतभिन्नता है कि ' यह भारतीय राजनीति की विडम्बना है कि दो दशक पहले जिन क्षेत्रीय दलों को प्रदेश के लोगों ने राष्ट्रीय राजनीति में एक संतुलनकारी भूमिका निभाने भेजा था, वे भी आज प्रमुख राष्ट्रीय दलों जैसे ही भ्रष्ट और अवसरवादी हो गए हैं। यदि इन दलों ने अपने पहले विदेशी निवेश विरोधी रुख से पलटी खाकर एफडीआई के प्रस्ताव को पास करने में मदद करी तो यह भारतीय लोकतंत्र के माथे पर एक बड़ा धब्बा होगा' मेरी समझ में .क्षेत्रीय दल का आधार हमेशा ही जातीयता, भाषा, अवसरवाद इत्यादि रहा है. मुझे इनसे कभी अपेक्षा नहीं रही कि ये दल राष्ट्रीय राजनीति में कभी संतुलनकारी भूमिका निभायेंगे.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

साहब जी बिगबोस अब हाथ से निकल गया है । हिटलरने उस का निकंदन कर दिया था फीर भी हिटलर को ही मरवा दिया । हिटलर उसे काबू नही कर सका तो अभी तो कोइ नेता नही बचा है उसे रोकने के लिए । चीन टक्कर लेगा, लेकिन उस की खूद की ईच्छा है बिगबोस बनने की । पूरी दुनिया में कोइ अपने देश का राष्ट्र प्रेमी नेता या बिगबोस की न सुनने वाला नेता उसे पसंद नही । उस को यातो गुलाम बनाता है या तो प्रजा मे विद्रोह करवा देता है या मार देता है । आपने अमरिका का जीक्र किया । अमरिका खूद गुलाम है बिगबोस का । धनी आदमी गुंडा पालता है ऐसे ही बिगबोस ने अमरिका को खरबों का घन उधार देता है और सुपारी किलर की तरह अमरिका का उपयोग करता है । वहां के नेता भी मनमोहन की तरह गुलाम ही होते है । दो केनेडी भाईयो को और लिंकन को मारा क्यों की गुलाम नही थे । २० के उपर पोप गायकों को मारा क्यों की अपने आल्बममे ऐसे गीत गाये की बिगबोस की पोल खूल जाती थी । लालबाहादुर शाश्त्री, ईन्दिरा, राजीवगांधी, सद्दाम, गद्दाफी सब उस के ही शिकार बने । ये लोग बिगबोस के हुकुम का अनादर करते थे । बिगबोस एक व्यक्ति नही समुह है । जीस में पोप, ब्रिटन का शाहीपरिवार, चर्च, यहुदी और अंग्रेज धनवान, फेंच और जर्मन सरकार बुश परिवार और हर क्षेत्र हे सेलिब्रीटी और भी काफी है । आपने उपर बताई वो सब संथाएं ईन के कबजे मैं हैं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

यह कैसी विडंबना है कि व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाले बस्तर के अनेक आदिवासी नेताओं पर , जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं , देशद्रोह के आरोप लगते हैं, जिन्होंने कभी भी देश के खिलाफ कोई काम नहीं किया है और वे सारे जुल्मों का मुकाबला कर रहे हैं। पर, उन्होंने व्यवस्था को ललकारने के बाद भी देश के प्रतीकों के साथ कभी खिलवाड नहीं किया। श्री आदित्य जी , आपका लेख पढ़ा , व्यवस्थित , scholar type , ज्ञान देता , समझाता , जैसे नन्हे बच्चों को सही और गलत की जानकारी दी जाती है ! आपके विचारों का अभिनन्दन करता हूँ लेकिन आपने विनायक सेन ......और अन्य के विषय में लिखा है की उन्होंने कोई विरोध नहीं किया , कोई राष्ट्रीय चिन्ह की अवमानना नहीं करी ...! ये जरूरी तो नहीं की जो ये करें वो सब करें ? मैं असीम के कृत्य को सही ठहराने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ किन्तु इतना कहना चाहता हूँ की इस वक्त जो गुस्सा है मुल्क में , उसका गर्मी को महसूस करिए , उसकी तीव्रता को महसूस करिए ! सच कहूं तो अगर सोनिया गाँधी इस वक्त बिना SPG सुरक्षा के बाहर निकल जायें तो लोग उन्हें कच्चा खा जायेंगे !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

यदि आप मेरे लेख को थोड़ा ध्यान से पढेंगे तो पायेंगे कि मैंने आपके सभी सवालों का जबाब उसमें दिया है | उदाहरण के लिए "आखिर जिस व्यवस्था में हम रह रहे हैं, उसमें ये उम्मीद आप कैसे कर सकते हैं कि वह आप को अपने प्रतीकों के साथ, चाहे वे कितने भी खोखले क्यों न हो गए हों, कोई भी खिलवाड़ करने देगी" कथन में स्पष्ट है कि शासक वर्ग ने स्वयं देश के प्रतीकों के साथ और देशवासियों के साथ खिलवाड़ करके उन्हें खोखला बना दिया है| अब यदि हम भी उसी रास्ते पर चलाकर संघर्ष करना चाहते हैं तो देश को बर्बाद करने वालों और उसे बचाने वालों के बीच कोई फर्क कैसे रह जाएगा| यहाँ सवाल कांग्रेस या किसी को भी बचाने का नहीं है, यदि ऐसा होता तो मैंने सवयम ढेरों लेख और मैदान में उतरकर संघर्ष नहीं किये होते| सवाल देश का सम्मान करते हुए देश के असम्मान करने वालों और और उसे खोखला करने वालों के खिलाफ संघर्ष का है, जिसके लिए सभी तैयार हैं| संघर्ष में गंभीरता सफलता की पहली शर्त होती है|जैसा कि मैंने लेख में भी कहा है, त्रिवेदी, इस देश के एकमात्र, पहले और सबसे अधिक बड़े कार्टूनिस्ट नहीं हैं। इससे पहले भी बड़े बड़े कार्टूनिस्ट हुए हैं और उनमें से अनेक राजनीति से भी जुड़े रहे। उनके कार्टून भी राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और कार्पोरेट्स को तिलमिलाते रहे हैं। उनमें से अनेक ने प्रताड़नाएं भी झेली हैं, पर, प्रतीकों के साथ उन्होंने खिलवाड़ किया हो, ऐसा मामला कभी सामने नहीं आया। क्या नागार्जुन जैसे कवि , जिन्होंने आजादी के तुरंत बाद नेहरु की नीतियों की भर्त्सना शुरू कर दी थी, कभी इस स्तर पर गए| भारत माँ की फोटो बनाकर उसे कुछ लोग रेप करने के लिए घसीटें, आपको रुचिकर लगता होगा या सही लगता होगा, मुझे तो इसमें मूर्खता और सनसनी फैलाकर प्रसिद्धि प्राप्त करने की बचकाना हरकत लगती है| यदि वास्तव में भारत माँ के साथ कथित बलात्कार हो रहा है तो उसे कार्टून से नहीं हाथ में अस्त्र लेकर लड़ने की जरुरत है और यदि उसके लिए लोगों को तैयार करना है तो ऐसे वाहियात कार्टून की नहीं, कुछ और चीज की जरूरत है| मैं इस बात को गहराई से जानता हूँ कि लोग आज भी अपने देश के प्रतीकों से प्यार करते हैं क्योंकि जो भी आधे अधूरे और टूटे फूटे अधिकार इस देश के 80 करोड़ बेचारगी झेल रहे लोगों को प्राप्त हैं, उन्हें आजादी के बाद उसी संविधान के तहत प्राप्त हुए हैं। उन्हें वो प्यारा है क्योंकि, वो उनकी झूठी और दिखावटी ही सही, पर, आजादी का प्रतीक है, जिसके लिए उन्होंने और उनके पुरखों ने जानें गंवाईं हैं और त्याग किये हैं।यदि ऐसा नहीं होता तो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को लोग इतने उत्साह से नहीं मनाते| व्यवस्था और सत्ता के खिलाफ संघर्ष भावुकता पर नहीं ठोस धरातल पर लड़े जाते हैं और उसके लिए सर्वप्रथम जिस व्यवस्था में हम रह रहे हैं , उसकी नस नस को पहचानना जरूरी है| इसीलिये मैंने अपने लेख की शुरुवात ही उस वास्तविकता से की थी कि "मुझे तभी लगा था कि आज नहीं तो कल त्रिवेदी की इस करतूत पर किसी न किसी का ध्यान जाएगा और फिर त्रिवेदी को देशद्रोह में धरा जाएगा। आखिर जिस व्यवस्था में हम रह रहे हैं, उसमें ये उम्मीद आप कैसे कर सकते हैं कि वह आप को अपने प्रतीकों के साथ, चाहे वे कितने भी खोखले क्यों न हो गए हों, कोई भी खिलवाड़ करने देगी।" मैं एकबार फिर दोहराना चाहूँगा कि "इस देश के अंदर ऐसे बहुत से लोग हैं, जो, वर्त्तमान संविधान के अनेक प्रावधानों को नहीं मानते और पहला अवसर मिलते ही उनमें परिवर्तन चाहेंगे और वह भी इस देश की दबी कुचली जनता के पक्ष में। क्या वे सब संविधान को इसी तरह अपमानित करें? फिर, आपकी लड़ाई क्या संविधान के खिलाफ है?" मैं आपका ध्यान नर्बदा पर बन रहे बाँध के खिलाफ अपना हक माँग रहे किसानों की तरफ आकृष्ट करूँगा, जो १७ दिन तक पानी में खड़े रहकर शान्ति पूर्वक आंदोलन करते रहे| ऐसा नहीं कि मैं आन्दोलनों में शान्ति का ही पक्षधर हूँ, मेरे उल्लेख का कारण यह है कि उन्होंने संविधान या अशोक चक्र को गालियाँ नहीं दी, जबकि सरकार को वे हर स्तर पर चुनौती देते रहे| मुझे आशा है कि मेरा मंतव्य आपको स्पष्ट हो गया होगा ऑ फिर, लोकतंत्र में मतान्तर तो स्वास्थ्य दिशा की तरफ ले जाने में सहायक होता है| आपके कमेन्ट के लिए अनेक धन्यवाद |

के द्वारा:

यदि आप मेरे लेख को थोड़ा ध्यान से पढेंगे तो पायेंगे कि मैंने आपके सभी सवालों का जबाब उसमें दिया है | उदाहरण के लिए "आखिर जिस व्यवस्था में हम रह रहे हैं, उसमें ये उम्मीद आप कैसे कर सकते हैं कि वह आप को अपने प्रतीकों के साथ, चाहे वे कितने भी खोखले क्यों न हो गए हों, कोई भी खिलवाड़ करने देगी" कथन में स्पष्ट है कि शासक वर्ग ने स्वयं देश के प्रतीकों के साथ और देशवासियों के साथ खिलवाड़ करके उन्हें खोखला बना दिया है| अब यदि हम भी उसी रास्ते पर चलाकर संघर्ष करना चाहते हैं तो देश को बर्बाद करने वालों और उसे बचाने वालों के बीच कोई फर्क कैसे रह जाएगा| यहाँ सवाल कांग्रेस या किसी को भी बचाने का नहीं है, यदि ऐसा होता तो मैंने सवयम ढेरों लेख और मैदान में उतरकर संघर्ष नहीं किये होते| सवाल देश का सम्मान करते हुए देश के असम्मान करने वालों और और उसे खोखला करने वालों के खिलाफ संघर्ष का है, जिसके लिए सभी तैयार हैं| संघर्ष में गंभीरता सफलता की पहली शर्त होती है|जैसा कि मैंने लेख में भी कहा है, त्रिवेदी, इस देश के एकमात्र, पहले और सबसे अधिक बड़े कार्टूनिस्ट नहीं हैं। इससे पहले भी बड़े बड़े कार्टूनिस्ट हुए हैं और उनमें से अनेक राजनीति से भी जुड़े रहे। उनके कार्टून भी राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और कार्पोरेट्स को तिलमिलाते रहे हैं। उनमें से अनेक ने प्रताड़नाएं भी झेली हैं, पर, प्रतीकों के साथ उन्होंने खिलवाड़ किया हो, ऐसा मामला कभी सामने नहीं आया। क्या नागार्जुन जैसे कवि , जिन्होंने आजादी के तुरंत बाद नेहरु की नीतियों की भर्त्सना शुरू कर दी थी, कभी इस स्तर पर गए| भारत माँ की फोटो बनाकर उसे कुछ लोग रेप करने के लिए घसीटें, आपको रुचिकर लगता होगा या सही लगता होगा, मुझे तो इसमें मूर्खता और सनसनी फैलाकर प्रसिद्धि प्राप्त करने की बचकाना हरकत लगती है| यदि वास्तव में भारत माँ के साथ कथित बलात्कार हो रहा है तो उसे कार्टून से नहीं हाथ में अस्त्र लेकर लड़ने की जरुरत है और यदि उसके लिए लोगों को तैयार करना है तो ऐसे वाहियात कार्टून की नहीं, कुछ और चीज की जरूरत है| मैं इस बात को गहराई से जानता हूँ कि लोग आज भी अपने देश के प्रतीकों से प्यार करते हैं क्योंकि जो भी आधे अधूरे और टूटे फूटे अधिकार इस देश के 80 करोड़ बेचारगी झेल रहे लोगों को प्राप्त हैं, उन्हें आजादी के बाद उसी संविधान के तहत प्राप्त हुए हैं। उन्हें वो प्यारा है क्योंकि, वो उनकी झूठी और दिखावटी ही सही, पर, आजादी का प्रतीक है, जिसके लिए उन्होंने और उनके पुरखों ने जानें गंवाईं हैं और त्याग किये हैं।यदि ऐसा नहीं होता तो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को लोग इतने उत्साह से नहीं मनाते| व्यवस्था और सत्ता के खिलाफ संघर्ष भावुकता पर नहीं ठोस धरातल पर लड़े जाते हैं और उसके लिए सर्वप्रथम जिस व्यवस्था में हम रह रहे हैं , उसकी नस नस को पहचानना जरूरी है| इसीलिये मैंने अपने लेख की शुरुवात ही उस वास्तविकता से की थी कि "मुझे तभी लगा था कि आज नहीं तो कल त्रिवेदी की इस करतूत पर किसी न किसी का ध्यान जाएगा और फिर त्रिवेदी को देशद्रोह में धरा जाएगा। आखिर जिस व्यवस्था में हम रह रहे हैं, उसमें ये उम्मीद आप कैसे कर सकते हैं कि वह आप को अपने प्रतीकों के साथ, चाहे वे कितने भी खोखले क्यों न हो गए हों, कोई भी खिलवाड़ करने देगी।" मैं एकबार फिर दोहराना चाहूँगा कि "इस देश के अंदर ऐसे बहुत से लोग हैं, जो, वर्त्तमान संविधान के अनेक प्रावधानों को नहीं मानते और पहला अवसर मिलते ही उनमें परिवर्तन चाहेंगे और वह भी इस देश की दबी कुचली जनता के पक्ष में। क्या वे सब संविधान को इसी तरह अपमानित करें? फिर, आपकी लड़ाई क्या संविधान के खिलाफ है?" मैं आपका ध्यान नर्बदा पर बन रहे बाँध के खिलाफ अपना हक माँग रहे किसानों की तरफ आकृष्ट करूँगा, जो १७ दिन तक पानी में खड़े रहकर शान्ति पूर्वक आंदोलन करते रहे| ऐसा नहीं कि मैं आन्दोलनों में शान्ति का ही पक्षधर हूँ, मेरे उल्लेख का कारण यह है कि उन्होंने संविधान या अशोक चक्र को गालियाँ नहीं दी, जबकि सरकार को वे हर स्तर पर चुनौती देते रहे| मुझे आशा है कि मेरा मंतव्य आपको स्पष्ट हो गया होगा ऑ फिर, लोकतंत्र में मतान्तर तो स्वास्थ्य दिशा की तरफ ले जाने में सहायक होता है| आपके कमेन्ट के लिए अनेक धन्यवाद |

के द्वारा:

आदरणीय अरुण जी.....सादर... आप का कहना एक दम सत्य है.... ''व्यवस्था और व्यक्तियों की आलोचना को देश तक मत ले जाओ ..! '' लेकिन क्या आप बताएँगे.....संसद के दोनों सदनों में कौन बैठे हैं...? क्या आप बताएँगे कि इन सभी में १६२ सांसदों पर हत्या, बलात्कार. डकैती, अपहरण. रिश्वत हेराफेरी और ना जाने क्या-क्या केसेस पड़े हुए हैं.......क्या इससे देश की गरिमा का अपमान नहीं होता....? क्या आपने पिछले साल संसद के दोनों सदनों में लोकपाल बिल की दुर्गति करते हुए सांसद नहीं देखे.....जबकि उन सभी में सत्तापक्ष के ही सांसद थे.....क्या इनकी लुटेरों जैसी हरकतों से देश की संसद और गरिमा का अपमान नहीं हुआ......??? क्या आपको पता है......यही सरकार लोकपाल बिल को लाने में आनाकानी कर रही है.....और मायावती के कहने पर संसद में दो ही दिन में आरक्षण बिल इनके मंत्रिमंडल ने पास कर के ससंद में पेश भी कर दिया....और संसद में पक्ष-विपक्ष से कहा कि इस बिल को पास करने में मदद करें.....वो तो भला हो भाजपा का......जिन्होंने इस पूरे सत्र में संसद को ही ठप्प कर दिया.....और ये बिल कानून बनने से रह गया......क्या ये देश की अधिकांश जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है......??? इस पर क्या कहेंगे आप.....??? आपकी बात पर एक शेयर अर्ज़ है..... ''हम चलें तो साया भी अपना साथ ना दे..... तुम चलो तो ज़मीं चले....आसमां चले...........'' ये साले चोर देश को सरेआम लूट कर खोखला कर रहे हैं.....और एक आम आदमी इन के खिलाफ आवाज़ भी नहीं उठा सकता.......लानत है....इस व्यवस्था और व्यक्तियों पर....... आज पहली बार हमें अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है...कि हम आपके साथ इस विषय पर सहमत नहीं हैं...... क्षमा चाहते हैं.....आदरणीय अरुण जी......

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

अक्क्षयदित्यभाई अब काफी देशों के प्रमुख अपने देशों के प्रमुख नही रहे । वो विश्व सरकार के सुबे हो गये हैं । बिगबोस के ईशारे पर हमारा सुबा ईरान गया है, ईरान के प्रमुख को समजाने की कोशीश करेगा । बोस के शरण में आ जाओ, मेरी तरह सुबा बन जाओ । तेरा भी भला होगा और मै भी धर्म संकट में फंसा हुं बाहर निकल आउंगा । बोस का गुर्गा मुझे तेरा बहिष्कार करने को बोलता है, ऐसा करुंगा तो मैतो मर जाउंगा, मेरा वोट हाथ से जायेगा । तेरा भी हाल साद्दम हुसेन जैसा होगा । बहाना कोइ भी निकाल के गये हो असली बात मैने जो कही वही है । आपने जीन लेखक की बात कही उन के विचार तो अच्छे है । लेकिन अच्छे विचार दुसरों पर थोपने के लिये होते है । खूद के लिए नही । वो खूद तो बिगबोस के सब से कातिल हथियार (आईएमएफ) मे काम कर के आया है । वो सब कुछ जानता है भारतमे आकर उसे क्या करना है । भारत को ज्यादा से ज्यादा कर्जदार बनाना है । प्रजा को मुर्ख समज कर कैसी कैसी योजना बनानी है और उस का सुजाव देना है । लोबी का विकास कर के कडी बानना है, कीस कंपनी के ईशारे क्या बयान देना है । निरा राडिया की टेप कीसने लीक की उसे पकडने की फिकर करवानी है, निरा को सजा देने की बात ही नही ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

हे प्रभु, लगभग दो वर्षों के बाद इस लेख पर आपकी प्रतिक्रिया से मैं ओतप्रोत हो गया हूँ| दरअसल मैं एक पत्रिका में लिखा करता था, वह एक हाऊस मेगजीन थी और संपादक नहीं चाहते थे कि मेरा नाम सबके सामने आये , इसलिए उन्होंने मेरा उपनाम आदित्य रखा और मैं लगातार लगभग दस वर्षों तक उसी नाम से उस पत्रिका में लिखता रहा, उसके बाद किसी की नादानी से वो बात उजागर हो गई तो उन्होंने मुझसे मेघनाद के नाम से लिखने का अनुरोध किया और उसी नाम से मेरे लेख व्यंग छापने लगे| अब वह सिलसिला लगभग दो वर्षों से बंद हो गया है| वैसे में अखबारों और अन्य पत्रिकाओं में जब भी लिखता हूँ तो इस उपनाम का प्रयोग नहीं करता | जहां तक जागरण जंक्शन में आदित्य लिखने का कारण है , वह यह है कि मेरे नाम से पहले ही किसी की आईडी थी और एकेएसआदित्य के नाम से वह उपलब्ध हो गई| इसी कारण से मेरा ब्लॉग भी aksaditya.blogspot.com है| जहां तक इस लेख में उपरोक्त पंक्तियों" मैं आपके समान विद्वान नहीं हूँ , अतएव नहीं जानता कि अपनी बातों को ठीक से रख पाया या नहीं" के इस्तेमाल का सवाल है , वे ह्रदय से लिखी गईं हैं| मैं जंक्शन पर एकदम नया था और कुछ दिनों बाद ही आदरणीय मिश्रजी और शाहीजी, निखिलजी जैसे वरिष्ठ और विद्वान लोगों से विवाद में मुझे विनम्र ही होना चाहिये था और वैसे भी मैं उद्दंड नहीं हूँ , ऐसा मेरा स्वयं का मानना है, कितना सही , कितना गलत मैं नहीं कह सकता, पर मैं कोशिश विनम्र रहने की ही करता हूँ, इसलिए मैंने उपरोक्त पंक्तियों को लिखा था | आपने दो वर्ष बाद प्रश्न उठाया, मैं गदगद हो गया, आपको असंख्यों धन्यवाद|  

के द्वारा:

दिनेश जी , उपरी तौर पर चीजें वैसी ही हैं, जैसी आपने बताईं, किन्तु मेरा मानना है कि दोनों में से कोई भी व्यवस्था परिवर्तन के लिए नहीं है, बल्कि उन्हें उन नारों , सम्पूर्ण क्रानित..व्यवस्था परिवर्तन के अर्थ भी नहीं मालूम | पूरे आंदोलन में जेपी की बहुत बात हुई..एक बात मैं पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं राजनीति में कांग्रेस या भाजपा किसी का भी समर्थक नहीं हूँ ..अब मैं जेपी के विचारों और बाद में क्या हुआ , इसके बारे में एक उद्धरण अपने ही अधूरे लिखे एक लेख से दे रहा हूँ... अन्ना और रामदेव के मंच से जेपी के आंदोलन और उनके सम्पूर्ण क्रान्ति के नारे की भी बहुत बात हुई| यहाँ तक कि नई राजनीतिक पार्टी बनाने के उद्देश्य को भी जेपी की तर्ज पर “सम्पूर्ण क्रांति” के नारे से जोड़ा गया| सम्पूर्ण क्रांति के अपनी अवधारणा के बारे में जेपी स्वयं 1936 में क्या सोचते थे और 40 साल बाद उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति के लिए जो आंदोलन चलाया, उसमें सम्पूर्ण क्रांति की वह अवधारणा कहाँ गई, उसकी भी पड़ताल किया जाना जरूरी है| जयप्रकाश ने 1936 में प्रकाशित अपनी किताब “समाजवाद ही क्यों” में गांधी के रामराज्य के सपने की आलोचना करते हुए लिखा था कि गांधी जी जिस रामराज्य का सपना देखते हैं, उसमें राजा के साथ भिखारी भी रहेगा, यह बात चौंका देने वाली है| ठीक भी है| भिखारी नहीं होंगे तो राजा को अपनी दानशीलता दिखाने का अवसर कैसे मिलेगा? गांधीवाद यह नहीं पूछता कि समाज में थोड़े से ही आदमी राजा,जमींदार और पूंजीपति क्यों हैं| वह उच्च और निम्न वर्गों वाली व्यवस्था स्वीकार कर लेता है| वह यह नहीं पूछता कि जमींदारों और पूंजीपतियों को अपनी दौलत मिलती कहाँ से है| दौलत के मालिकों से कहा जाए कि यह दौलत तुम्हारे पास धरोहर के रूप में है, तो “एक समाजवादी के लिए इस विचारधारा का मतलब होगा धोखा देना, खुद को धोखा देना और शोषित जनता को धोखा देना| हमारे विचार से जमींदारों और पूंजीपतियों को वो दौलत किसानों और मजदूरों की मेहनत के बल पर मिलती है और इसलिए प्रूंदो की प्रसिद्द शब्दावली में वह चोरी का माल है| इस चोरी को चलने दिया जाए, उसके बारे में सवाल नहीं किया जाए, उसे न्यायपूर्ण करार दिया जाए, यह सब धोखा देने वाली विचारधारा है, भले ही वह अनजान में धोखा देती हो| उच्च वर्ग चोरी के ही अपराधी नहीं हैं, वे हिंसा के भी अपराधी हैं| वे हिंसा के अपराधी इसलिए हैं कि वे जनता के बनाए माल की चोरी हिंसा के द्वारा कायम रखते हैं और उसकी रक्षा करते हैं| अगर क़ानून न हो, और जान लेना चाहिए कि यह एक वर्ग का क़ानून है, और उसे लागू करने के लिए हिंसा की संगठित शक्ति मौजूद न हो, तो किसान और मजदूर कल ही जमीन और कारखानों पर कब्जा कर लें|” मतलब यह कि सम्पूर्ण क्रांति के लिए दो बातें जरूरी हैं| पहली यह कि जो किसान जमीन जोतता है, वह उस पर कब्जा करे; दूसरी यह कि कारखानों में काम करने वाले मजदूर उन पर कब्जा करें| भारत के समाजवादी नेता और जयप्रकाश नारायण यह बात 1936 में अच्छी तरह जानते थे किन्तु चालीस साल बाद उन्होंने जो सम्पूर्ण क्रांति का आंदोलन चलाया, उसमें न तो जमीन पर जोतने वालों के अधिकार की बात थी, न कारखानों पर मजदूरों के कब्जा करने की| अन्ना और रामदेव के सम्पूर्ण क्रांति के नारे तो और भी दिग्भ्रमित करने वाले और चालाकी से देश के उद्योगपतियों और संपन्न तबके के हितों की रक्षा के लिए पेश किये जा रहे नारे हैं, क्योंकि जेपी जानते तो थे कि क्रांति के मायने क्या हैं, पर अन्ना या रामदेव के बारे में क्या कोई यह कह सकता है कि वे क्रांति के मायने जानते हैं ? आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ हों या कालेधन के खिलाफ, नारे के तौर पर ये अपील कर सकते हैं और फौरी तौर पर पेट भरे लोग उससे जुड़ते भी हैं, पर, इन आन्दोलनों से जन अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकतीं| इसके लिए तो आंदोलन वैश्वीकरण को उलटने का ही होना चाहिए और डंडी थामे अगड़े इसे करेंगे नहीं| यह तो इस देश के जन ही करेंगे| इसका स्वरूप कैसा होगा, यह तो भविष्य में ही पता चलेगा| मैंने अपनी बात साफ़ करने की कोशिश की है, फिर तो ये एक लंबा चलने वाला विचार विमर्श और संघर्ष है| धन्यवाद ..

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जर्मनी की सरकार 2022 तक अपने सभी परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों को समाप्त करने का निर्णय कर चुकी है। इटली और स्विजरलैंड ने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों पर आगे काम नहीं करने का निर्णय लिया है। परमाणु ऊर्जा का विकल्प साफ़, स्वच्छ और प्रदूषण रहित ऊर्जा के रूप में हवा, सोलर, जैव ऊर्जा, पानी और बायो ऊर्जा के रूप में मौजूद है। प्रश्न, इसे बुद्धिमत्तापूर्वक और सावधानी के साथ इस्तेमाल करने का है। एक उचित ग्रिड प्रणाली और विद्युत ऊर्जा के व्यर्थ उपयोग पर पाबंदी से इसे समाधान के रूप में आजमाया जा सकता है और हमारे समक्ष कोई अन्य विकल्प नहीं है। हमें इसी समाधान पर आगे बढ़ना होगा, यदि हमें मानव प्रजाति को भविष्य में विकलांग पैदा नहीं करना है तो। ये एक बड़ा सच है कि आने वाले कुछ दशकों में ही इस विकास को उलटने की दिशा में मजबूर होना पड़ेगा, जो मानवभक्षी होता जा रहा है| इस बात को मैं ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसमें मंथन शुरू हो चुका है और वो पीडी कुछ ही दशकों में उस मुल्क में आ जायेगी , जहां से मानवभक्षी विकास शुरू हुआ था , जो उसे पीछे ले जायेगी | भारत आज संभालता है तो ठीक, यदि नहीं तो देश की कुछ पीड़ियों की बर्बादी के बाद संभलेगा .. यह सोचने का विषय है , इस पर सहमती या असहमती की अभी कोई गुंजाईश नहीं है|

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परमाणु ऊर्जा का विकल्प साफ़, स्वच्छ और प्रदूषण रहित ऊर्जा के रूप में हवा, सोलर, जैव ऊर्जा, पानी और बायो ऊर्जा के रूप में मौजूद है। प्रश्न, इसे बुद्धिमत्तापूर्वक और सावधानी के साथ इस्तेमाल करने का है। एक उचित ग्रिड प्रणाली और विद्युत ऊर्जा के व्यर्थ उपयोग पर पाबंदी से इसे समाधान के रूप में आजमाया जा सकता है और हमारे समक्ष कोई अन्य विकल्प नहीं है। हमें इसी समाधान पर आगे बढ़ना होगा, यदि हमें मानव प्रजाति को भविष्य में विकलांग पैदा नहीं करना है तो। कम से कम, हमसे, ये तितलियाँ तो यही बोल रही हैं कि परमाणु ऊर्जा, इससे बचो!!! शुक्ल साहब, काफी शोध के बाद आपने यह उपयोगी आलेख तैयार किया है . इसे भी उपयुक्त महत्व दिया जाना चाहिए! विकिरण का खामियाजा, भोपाल की यूनियन कार्बाईड कंपनी की त्रासदी आजतक झेल रहे हैं. और एक बात जो आपने कही - "सरकारें किसी भी देश की हों, जब सवाल पूंजीपतियों के मुनाफे और मानव जीवन के बीच झूलता है, तब उन्हें पूंजीपतियों के मुनाफे के खातिर, मानव जीवन को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर भी पूंजीपतियों के पक्ष में झूठ बोलने में कोई हिचक नहीं होती है।" क्योंकि समरथ को नहीं दोष गुसाईं. आपको बहुत बहुत बधाई, इस आलेख को साझा करने के लिए!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

थोड़ा और .....     रामदेव जी, मुझे एक बच्ची ही रहने दीजिये जो अपने बर्थडे पर केक काटकर और कुछ गिफ्ट पा कर खुश हो जाती है। मै तो डर गयी थी कि कहीं आपने मुझे परिपक्वता दे दी तो मै जो कुछ लोगो के गोद मे खेल रही हूँ वहां से निकल कर जनसाधारण के झोपड़ों मे भी जाना पड़ेगा।  रामदेव जी,आप से पहले भी कई तेज तर्रार भारतपुत्रों ने मुझे जनसाधारण तक पहुँचाने का प्रयास किया, उन लोगों ने तो मेरे बदले में ख़ून भी मांगा था और हां हिटलर से दोस्ती भी की थी किन्तु अगर उनके बारे  में  इस दबंग आवाज ने कुछ कह दिया तो जनता इस आवाज की ऐसे तैसे कर देगी इस लिये आपको हिटलर का बेटा कहकर  इस दबंग आवाज का अपनी दिमागी खुजली मिटानी पड़ रही है।रामदेव जी,वैसे तो आपको कई बार स्वदेशी की उत्पादों को प्रयोग करने और विदेशी उत्पादों के विरोध मे जनजागरण करते देखा है किन्तु इस दबंग आवाज के कानों आपकी वो बात नहीं पड़ी तभी तो इन्होने आप और अन्ना पर ये आरोप लगा दिया  कि कोई ये नहीं कह रहा कि अपना बाजार विदेशियों हवाले न करो। अधिक क्या कहूँ, आप तो जानते ही हैं कि  भारत दार्शनिकों का देश है ,तो इन्हे दर्शन करने दीजिये। मुझे कुछ ऐसी जड़ी बूटी दीजिये कि कम से कम 60 साल से अधिक आयु हो जाने पर भी शैशवास्था से यौवन प्राप्त कर सकूँ।         आपकी गुहार लगाती आजादी............

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

दिनेश जी के विचारों से बहुत हद तक सहमत! अन्ना जी के सन्दर्भ में मुझे यह कहना है कि इसका उद्देश्य तो अच्छा है पर जन समर्थन जितना मिलना चाहिए था इस बार नहीं मिला. यहाँ पर रन नीति के कमी है. टीम भावना की कमी है इनके सदस्यों की आपसी महत्वकांक्षा से जनता उहापोह में है स्वयम अन्ना भी टीम को भंग कर सोच में पर गए हैं. जनता ही उन्हें पुनर्जीवित कर सकती है. रामदेव द्वरा तो सत्ता का हस्तांतरण ही होगा .... पर वह भी अगर हो जाय तो वर्तमान परिस्थिति से कुछ हद तक छुटकारा मिलेगा ... पूरी आजादी अभी दूर की कौड़ी है ऐसा मेरा मानना है! जबतक स्वच्छ लोग राजनीति में नहीं आएंगे और जनता को नहीं जगायेंगे स्थिति में सुधार बड़ी मुश्किल है! प्रयास जारी है हम सब एक दुसरे के आभारी हैं!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

श्रद्धेय ,.सादर प्रणाम मर्मस्पर्शी लेख अच्छा लगा ,. आंदोलन देश की आजादी के लिए ही था ,..आज हमारी पूरी व्यवस्था अंग्रेजों की है ,..बांटकर राज करो उनकी नीति है ,...सरकार की अर्थी निकालना कहना कोई दंभ ,सनक और बडबोलापन नहीं मानूंगा ,...मुर्दा हो चुकी कौम को जगाने के लिए सब जायज है ,..हमारी आजादी देश के गद्दारों के हाथों बंधक है ,..और तब तक रहेगी जब तक हम, आप या दिनेश जी जैसे लोग छिद्रान्वेषण करते रहेंगे ,..बाबा रामदेव योग के माध्यम से आध्यात्मिक सुखी समृद्ध देश बनाना चाहते हैं ,..हमें उनका समर्थन ही करना चाहिए ,..यदि ज्यादा व्यस्त हैं तो कम से कम पंचर करने का काम तो नहीं करना होगा ,......यदि किसी बात से जरा भी कष्ट हो तो मूर्ख समझकर क्षमा करियेगा ,...सादर आभार सहित पुनः प्रणाम

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आदित्य जी, सादर नमस्कार। अप्रत्यक्ष रूप से वास्तविकता का परिचय कराती हुई आपके आलेख के विचारों से सहमत हूँ। यदि सच कहा जाय तो बाबा रामदेव जी का आन्दोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं है, अपितु  अन्ना टीम के खिलाफ है। दोंनो ही सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखकर किंग मेकर की भूमिका  में आना चाहते हैं। यह भी सत्य है कि एक की असफलता, दूसरे की सफलता है। तथा दोनों की  असफलता ही सरकार की सफलता है। बाबा जी सफलता काँग्रेस की असफलता तथा अन्ना टीम  की सफतलता पूरी राजनैतिक जमात की असफलता है। रामदेव जी का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन है। जबकि अन्ना टीम का उद्देश्य व्यवस्था परिवर्तन है। रामदेव जी का अपना संगठन है। लेकिन  इनके साथ आम आदमी नहीं है। जबकि अन्ना टीम का अपना कोई संगठन नहीं है, लेकिन आम आदमी इनसे जुड़ा हुआ है। ऐसा मेरा मानना है।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

जवाहरभाई, अब हल ढुंढना जनता के हाथ नही रहा । उस से लडने में हिटलर भी हार गया था तो हम लल्लु क्या कर पायेंगे । हिटलर ने तो फिर भी कोशिश की उन की जाति का निकंदन निकालने की । आज वही लोग ईकोनोमी को हथियार बना के सारी दुनिया को नचा रहे है । सारी दुनिया के देशों को कर्जा देकर अपना गुलाम बना दिया है । आज कौन सा देश प्लस मे हैं । जापान को छोड के कोइ भी नही । सब माईनस में चल रहे हैं । सब पर अरबों का करजा है । करंसी गई किधर । हमने तो नही सुना जला दी गई है । सब ईन पूडल के मालोकों के खातेमें गई है । विश्व की बडी बडी बैंको के चैरमॅन बन गयी हैं । मल्टिनेशन कंपनियों के मालिक बन गये हैं । बडे बडे निवेशक बन बैठे है । हम अमरिका को कोसते हैं अमरिका खूद उसका पूडल है । उसे सुपारीबाज गुंडे की तरह उपयोग किया जाता है । अमरिका का केनेडी काबू में नही आ रहा था, उडा दिया । सद्दाम और गद्दाफी काबू से बाहर थे, खतम कर दिये । आज ईरान के प्रमुख के पिछे पडे हैं उसे भी खतम करेंगे । लाल बहादुर शास्त्री को देश प्रेमी बनने का शौक था उडा दिया । ईन्दिरा खूद बॉस बन गई थी पूडल नही बन सकती थी उडा दिया । राजीव के पास अपनी कोइ सोच य बडी महत्वकांक्षा नही थी लेकिन भावना भरपूर थी वो देश प्रेमी बन सकते थे, उडा दिया । नाटक किया आतंकियों ने मारा । लेकिन आतंकी भी उन के ही पूडल है । अपने ही पूडल ओसामा की मदद से अमरिका के दो टावर उडा दिये, अमरिका को उकसाने के लिये । एक समय के पूडल रहे तालिबान काबू के बाहर निकल गये थे । तलिबानों को हराया अमरिका की मदद से । अपनी कठपूतली को सत्ता दे कर अफघानिस्तान से वापस जा सकते थे । लेकिन नाटक बहुत बाकी था । ओसामा को मारना नही था लेकिन विश्व की जनता को बताने के लिए जुठा नाटक तो करना चाहिए, किया । अटकता हुं बात लंबी है । शोर्ट में कहुं तो ये जो बात उठी है वो एम.एम को ईशारा है की अब आप राजीनामा दे दो तो हमारा असली पूडल राहुल आप की जगह ले पाये ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय डा. साहब , इसमें क्षमा माँगने की क्या बात है | एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष ने ऐसा किया , मुझे अच्छा नहीं लगा , तो मैंने लिखा | राजनैतिक दलों को ये समझना ही पड़ेगा कि चाहे उनकी राजनीति कुछ भी हो , पर हैं वे पूरे राष्ट्र के राहानीतिक दल और उस अनुसार उन्हें अपना औसत व्यवहार सेट करना पड़ेगा और ये आज नहीं हो रहा है , पर कल जरुर होगा | जहां तक आपके बीजगणित की बात है , भारतीय संदर्भ में वह है पर फार्मूला कुछ ऐसा है | यूपीए = कांग्रेस की तानाशाही + भाजपा का अल्पसंख्यक विरोधी रवैय्या + राजनैतिक दलों की अवसरवादिता , जिसे वामदल भाजपा के अल्पसंख्यक विरोधी रवैय्ये के भयवश समर्थन देते है |और कांग्रेस फासीवादी नहीं है , यह एक पार्टी है जो सत्ता में आने के बाद तानाशाह हो जाती है और जरूरत के अनुसार साम्प्रदायिकता के साथ समझौता कर लेती है | पर , ये किसी भी हालत में नस्लवादी या फासीवादी नहीं है , जैसा कि भाजपा के मामले में है | मैं कांग्रेस या वाम किसी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ | मेरा सीधा कहना है कि गडकरी को ऐसा नहीं करना चाहिये था क्योंकि वो उस समय भाजपा के अध्यक्ष के रूप में रामदेव से मिल रहे थे | शेष कुशल | आपको बहुत बहुत धन्यवाद |

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आदरणीय श्री सतीश जी , सादर नमस्कार ! आपने जिन बिन्दुओं की तरफ इशारा किया है , सटीक हैं ! लेकिन आप इस बात से जरूर सहमत होंगे की कार्टून न केवल एक कला है बल्कि अपनी बात को समझाने का एक बेहतर जरिया भी हैं कार्टून ! तो अगर कार्टून बनाने पर , छपने पर प्रतिबन्ध की बात आती है तो क्या ये अभिवक्ति को दबाने की बात नहीं होगी ! हालाँकि यहाँ सवाल अभिव्यक्ति का नहीं है लेकिन गलत परंपरा की बात तो है जो शुरू होने जा रही है ! किसी विशेष समुदाय के किसी विशेष व्यक्ति के सन्दर्भ में अगर कोई बात कह दी जाये और उस पर हंगामा होने लगे तो हो गया बंटाधार ! फिर तो कुछ भी कहना कुछ भी लिखना मुश्किल हो जायेगा ! बहुत ही बढ़िया विषय पर सार्थक और सटीक लेखन , श्री सतीश जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय रायजी , ये कार्टून सिखाने के लिए नहीं डाले गये हैं | आप गूगल पर एडुकेशनल कार्टून लिखाकर क्लिक करिये , आपके सामने एक से एक ढेर सारे कार्टून आयेंगे | ये व्यंग कार्टून हैं जो राजनीतिक अपने अपने अनुसार कोर्स में डलवाते रहेंगे | आज की परिस्थिति में कल जब यूपीए सरकार नहीं रहेगी तो दूसरी सरकार इनको निकालकर दूसरे कार्टून डालेगी | याने हर पांच साल में आप एक नयी पूर्वाग्रह से ग्रस्त युवाओं की फ़ौज देश में खड़ी करते जायेंगे और जो बाद में सड़कों पर आपस में लड़ती रहेगी | इसमें आपका याने सही सोच वालों का नंबर कभी नहीं आएगा | ऐसे व्यंग कार्टून कार्टून होते हैं , इनसे बच्चों को कोई शिक्षा नहीं मिलती बल्कि ये बच्चों को गुमराह ही करते हैं | शिक्षाप्रद कार्टून अलग होते हैं , उनसे किसी का कोई विरोध नहीं है | शिक्षा का स्तर कितना गिर गया है , वो लेख के अंत में मैंने जो नर्सरी की कविता लिखी है , चीख चीख कर बताती है | ये आज के शिक्षाविद सरकारी सुविधाओं को पाते हैं , और यूरोप और अमेरिका की सैर करके वहाँ की भौंडी नक़ल भारत में परोसते हैं | जहां तक इनको मिलने वाले तमगों और उपाधियों का सवाल है , वह तो किसी न किसी को मिलना ही है , आखिर मौजूद अयोग्यता में से ही तो आपको योग्यता को चुनना है | आप योगेन्द्र यादव का लेख पढ़िए , मंतव्य साफ़ नजर आएगा | विरोध शिक्षा में कार्टून के होने का नहीं बल्कि राजनीतिक कार्टूनों का है , वो भी छोटी कक्षाओं में | सभी कलाओं की तरह कार्टून को भी सम्मान मिलना चाहिये | आपके विचारों के लिए धन्यवाद |

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आदरणीय आदित्य साहिब……सादर नमस्कार ! मई दिवस के सन्दर्भ में आपने बहुत बढ़िया लेख दिया है ! आपने सत्य कहा, स्थिति बहुत विस्फोटक होती जा रही है…..लेकिन इनके बारे में सोचे कौन? इस का सबसे बड़ा उदाहरण इस साल का बजट है, क्या दिया मुलाज़िमों को? और जो एक हाथ से दिया वो दूसरे हाथ से वापिस भी ले लिया…. देखा जाये तो इस सरकार को अपना ही नहीं पता, कि कल इनके साथ क्या होना है, सत्ता में रहेंगे या नहीं…क्या पता? जिस महान आदमी के नाम पर पार्टी बना कर ये राज कर रहे हैं, उस के खून से सनी हुई मिट्टी तक इनके सामने नीलाम कर दी गयी, और इनको शर्म तक नहीं आई….ये भला देश के मजदूरों/मुलाज़िमों के बारे में क्या सोचेंगे? हमारे यहाँ युवा के हाथ में हुनर तो है किन्तु काम नहीं ! सुन्दर और विचारणीय आलेख…

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

योगी जी , आपका चिंतन सटीक है | दरअसल , पिछले दो दशकों में शासक वर्ग पूरी तरह पूंजीवाद के गिरफ्त में है और उत्पादन के स्तर पर सेचुरेशन बिंदु पहुँचाने और जनता के बड़े हिस्से के हाथ में खरीद कर सकने की ताकत के नहीं होने के कारण , मुनाफ़ा अब पूरी तरह श्रम के मूल्य में कटौती और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के साथ मनुष्य की जीवनोपयोगी आवश्यकताओं को आर्थिक मूल्य की वस्तुओं में बदलने पर ही टिक गया है | राष्ट्रीय जल नीति में पानी को निजी हाथों में सौंपने और उसका मोल ठहराने का प्रस्ताव उसी का हिस्सा है | आज कुछ भी अलंकारिक और पवित्र प्रतीक के रूप में नहीं है , सब बिकाऊ है और जिनके पास धन सत्ता ओर राज सत्ता है , वे उस पर कब्जा करने में लगे हैं | देखिये मुझे पूरा अंदेशा है , एक दिन वो हमसे सांस लेने की कीमत भी मांगेंगे | आपके प्रोत्साहन के लिए कोटी कोटी धन्यवाद |

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आदरणीय , आदित्य जी नमस्कार ! उदारवादी नीतियों को अपनाते समय उसके दूरगामी परिणामों पर चिंतन नहीं किया गया था अन्यथा ऐसी दुर्दशा देखने का अवसर नहीं आता। यू पी ए सरकार अपनी मनमानी पर उतारू है जिसके कारण उसके प्रति असंतोष का भाव बढ़ते हुए उग्र रूप धारण कर रहा है।पिछले दो दशकों में एक के बाद एक आयी सरकारों ने टेक्स में राहत और सहायता के नाम पर अनाप शनाप तरीकों से पैसे देकर देश के पूंजीपतियों की परिसंपत्तियों में बेशुमार ईजाफा कराया है और उसकी पूरी वसूली देश के मेहनतकशों और आम आदमी से की है | मनरेगा , राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना जैसी योजनाएं वामपंथ के दबाव में और सत्ता की राजनीति की मजबूरी में लाई भी गयीं है तो भ्रष्ट तंत्र उनका फायदा वांछित लोगों तक पहुँचने नहीं दे रहा है | आपका आशीर्वाद चाहूँगा ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/02/14

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय अरुणकांत जी नमस्कार, आय की इस असमानता ने समाज में बैचैनी और अस्थिरता को बढ़ा दिया है , जिसका परिणाम हमें निचले स्तर पर बढते लूट , डकैती और हत्याओं जैसे अपराध के रूप में दिखाई पड़ रहा है तो समाज के उच्च स्तर पर राजनीतिज्ञों , नौकरशाहों , उद्यमियों और व्यापारियों के मध्य पनपे नापाक गठजोड़ के रूप में दिखाई पड़ रहा है , जो देश की संपत्ति को लूटने , भ्रष्ट तरीकों से धन कमाने , रसूख और पैसे के बल पर अय्याशी करने में लगा हुआ है | पिछले दो दशकों में एक के बाद एक आयी सरकारों ने टेक्स में राहत और सहायता के नाम पर अनाप शनाप तरीकों से पैसे देकर देश के पूंजीपतियों की परिसंपत्तियों में बेशुमार ईजाफा कराया है और उसकी पूरी वसूली देश के मेहनतकशों और आम आदमी से की है | मनरेगा , राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना जैसी योजनाएं वामपंथ के दबाव में और सत्ता की राजनीति की मजबूरी में लाई भी गयीं है तो भ्रष्ट तंत्र उनका फायदा वांछित लोगों तक पहुँचने नहीं दे रहा है | अब इतना सब हो रहा है तो क्या होगा मेहनत करने वाले आक्रोशित हैं वो ये सब ख़ुशी से नहीं मजबूरी से कर रहे हैं . काश सरकार इसे समझ सकती ...

के द्वारा: mparveen mparveen

आदरणीय शाही जी , आपका कथन सच है | गूगल और फेसबुक पर कसा जा रहा शिकंजा पहली बार आम आदमियों पर जा रहा है | अखबारों और अन्य माध्यमों में तो पहले ही नामचीन लोग लिखते रहे हैं और उनमें से न बिके हुए ढूँढने से भी कितने मिलेंगे कहना मुश्किल है | उदारवादी दौर का यह संक्रमणकाल है और कम से कम दो दशक और चलने वाला है | यद्यपि इसके खिलाफ केवल भारत में नहीं वैश्विक स्टार पर विरोध होई रहा है किन्तु वह बहुत कमजोर है |आपको जानकर आश्चर्य नहीं होगा कि जिन अखबारों में नियमित लिखता रहता हूँ , उन्हीं ने मेरे इस लेख को प्रकाशित करने से कई कारणों को बताते हुए विनम्रता से मना कर दिया | आपके प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद |

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श्रद्धेय शुक्ल जी, आपके द्वारा उठाई गई समस्या जायज़ है । जैसे सभी पुलिस वाले देखने में एक तरह के लगते हैं, वैसे ही सभी नेता और पार्टियां भी सत्ता में आने के बाद अपने असली रूप में आ जाते हैं, और जो भी जायज़-नाजायज़ लाभ पावर के माध्यम से हासिल किया जा सकता है, उसे हासिल करने के मामले में कोई कंजूसी नहीं करते । पत्रकारिता को खरीदना या दबाना भी सत्ता द्वारा उठाए जाने वाले अनेक नाजायज़ फ़ायदों में से ही एक है । यह तो मात्र प्रादेशिक स्तर के छोटे से दायरे की बात है, जो हमारी चहारदीवारी की सीमाओं में है । सत्ता का अहंकार तो अपने मद में चूर होकर अपनी सीमाएं तोड़ते हुए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स तक को प्रभावित करने से भी पीछे नहीं हटता । बानगी आप देख ही रहे हैं, कि जिन साइट्स पर जुटकर हम हंसते बोलते बतियाते हुए अपने दिल की भँड़ास निकाल कर थोड़ी रोज़मर्रा की थकान उतारते हैं, हमारे सत्ताधीशों को वह भी फ़ूटी आँख नहीं सुहा रहा, और ये उनपर अपनी चाण्डाली वक्र दृष्टि डालकर अपनी दाढ़ी का तिनका निकाल फ़ेंकने की फ़िराक़ में लग चुके हैं । साधुवाद !

के द्वारा:

आने वाले दिनों में उम्मीद की किरण व्यक्तिपरक होगी, सामूहिक या दलगत नहीं । इसका आभास विगत कई चुनावों उपचुनावों के परिणाम देखकर हो जाता है । जनता ने व्यक्तिगत गुणों के आधार पर उम्मीदवारों को विजयी बनाया । बिहार के परिणाम जेडीयू दल के नहीं, बल्कि नितीश कुमार के पक्ष में गए, इस तथ्य से सभी वाक़िफ़ हैं । जनता को अपने निर्णय का सुकूनदायी प्रतिफ़ल भी प्राप्त हो रहा है । हमारे झारखन्ड में जमशेदपुर के उपचुनाव में भूतपूर्व पुलिस अधीक्षक अजय कुमार ने अपनी पूर्व ईमानदार आईपीएस छवि के बूते पर बड़े बड़े दिग्गज़ों, यहां तक कि सत्तारूढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष तक का सूपड़ा साफ़ कर दिया, ज़मानत तक नहीं बची । झारख्नन्ड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरान्डी ने, जिनकी पार्टी के टिकट पर अजय कुमार जीते थे, यह भ्रम पाल लिया कि यह सबकुछ उनकी अपनी साख की बदौलत हो रहा aहै । इसी भ्रम में मान्डू विधानसभाई उपचुनाव में उन्होंने एक अरबपति व्यवसायी को अपनी पार्टी का टिकट दे दिया, जिन्हें धूल चटाकर जनता ने झामुमो के एक स्थानीय नौजवान को जिताना अधिक श्रेयस्कर समझा । व्यवसायी उम्मीदवार का करोड़ों फ़ूंकना किसी काम नहीं आया । तात्पर्य यह है कि बदलाव की बयार तो बहती दिख रही है, बस इसके तूफ़ान बनने का इंतज़ार है । शायद अब वाम दक्षिण तथा हस्त और कमल के दिन बहुत जल्द ही लद जाने वाले हैं । काम आएगा तो सही उम्मीदवार को चुन कर अपना टिकट बांटना, अन्यथा हर झंडे की लुटिया डूबनी तय है । सचमुच यहां ठंड कुछ अधिक है श्रद्धेय … आभार !

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बिना दुर्योधन का महाभारत – ये आप की कोंग्रेस के प्रति अंध श्रध्धा है । भारत की और जनता को दुर्योधन ही दुर्योधन नजर आते हैं । जनलोकपाल की अवधारणा से कोइ सहमत नही है ईस का एक ही कारण है । कुल्हाडी पर पैर नही रखना है । अन्नाने शराफत दिखाकर चोरों को ही चोर पकडने का कानून बनाने के लिये दे दिया । हाल तो यही होना था । मौका था क्रान्ति का सब को उखाड फैंकने का । संविधान का कबजा चोर कर ले तो यही उपाय था । टीम अन्ना, टीम अन्ना क्या है, भारत की जनता की आवाज है । यदि सरकार या कांग्रेस देश के साथ सबसे बड़ा धोखा करती है तो उसकी आरती तो नही उतारते । इसमे आंदोलन की सीमितता और भटकाव की बात कहां है । भटक तो आप गये हैं और औरों को भी भटका रहे हैं । प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था स्वयं एवं अपने प्रतीकों को बचाये रखने के लिये अपनी पूरी शक्ति लगाती है | इसीलिये , अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का समर्थन करते हुए भी प्रत्येक राजनीतिक दल ने संसद की प्राथमिकता और सर्वोच्चता का प्रश्न सबसे पहले रखा और आज भी वे यही कह रहे हैं | फ़ौरन सियासी लाभ प्राप्त करने के लिये , वे कितना भी अन्ना के मंच पर न आ जाएँ , किन्तु , राजनीतिक व्यवस्था को बचाए रखने के खातिर , वे सभी एक हैं । उन सब को तो एक होना है जनताने गरदन जो पकडी है । सामान्य संजोगों मे ये सब बात ठीक है पर आज सामान्य संजोग नही है । यह तय है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का एक और दौर देशवासियों को देखने मिलने वाला है | जरूर देखने मिलेगा और अन्ना विरोधी सारे बुद्धिजीवी देखते रहेंगे । इस पूरे दौर में केन्द्र सरकार अथवा कांग्रेस को यह सफलता मिली है कि वे “भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन” जैसे बड़े लक्ष्य को लेकर शुरू हुए आंदोलन को केवल “कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन” के स्वरूप में मोड़ने में कामयाब हुए हैं और टीम अन्ना और स्वयं अन्ना उस भटकाव का शिकार हुए हैं | यही कारण है कि अन्ना के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में जुटे समर्थकों का बहुत बड़ा मुखर और अमुखर हिस्सा आंदोलन से इसलिए अलग होता गया कि उसे टीम अन्ना के सदस्यों और स्वयं अन्ना के व्यवहार और नीतियों से यह आंदोलन मात्र कांग्रेस विरोधी लगने लगा | बराबर लिखा, जाने अनजाने आपने कोंग्रेस की पोल खोल दी है । कोंग्रेस यही चाहती थी की लोग अन्ना को छोड के चले जाये, लोकपाल न लाना पडे । आप ने तो कोंग्रेस की चोरी ही पकड ली है । अन्ना के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का पूरा जोर सरकार में शामिल राजनीतिज्ञों और नौकरशाही के खिलाफ ही है | अन्नाने भष्टाचार के पेड का मूल पकडा है, टहनी पकड ने से क्या फायदा । भाई साहब लोकपाल पोलिस चौकी नही है, मजबूरी है । देश के कारपोरेट सेक्टर को जनता से अलग क्यों मानते हो । पैसा आ जाने से उन के लिए कानून बदल जाएगा । अगर पैसे के बल पर कानून खरीदता है तो सरकार जीम्मेदार है, बिकाउ चीज को हर कोइ खरिदता है । सरकार खूद बाजार लगाये बैठ जाती है उसे रोकना है । देश का हर आदमी आम नागरिक है । संस्था हो या व्यक्ति । वो हमेंशा से भ्रष्ट थे, है और रहेंगे । उसे कन्ट्रोल करने और दूनिया को जीनेलायक बनाने के लिए राज्य व्यवस्था बनाई गई है । तो जरूरी हो जाता है वो अच्छे आदमी संभाले । लेकिन आज अच्छे आदमी का अकाल पडा है तो अन्ना की एक कोशीश है की पहले उसे सुधारा जाये । क्या बूरा करते हैं । आप सपोर्ट करने के बदले भटका रहे हो ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

किसी ठोस आधार वाले ईमानदार विकल्प के अभाव में बार-बार ठगा जाना ही हमारी नियति बन चुका है । सच है , और अफसोस इसका है कि जो ठोस आधार वाला विकल्प दे सकते हैं , वो अपने तंग घेरों , भ्रांतियों और अंदरूनी संघर्षों से ही बाहर नहीं आ पा रहे हैं | देश के युवा का बहुत बड़ा हिस्सा पांचवें , छठवें और सातवें दशक के मध्य तक वाम से प्रभावित और जुड़ा रहा , पर उसे भी अंततः निराशा ही हाथ लगी | उम्र के इस दौर में पूरे अनुभवों के साथ शायद आज मैं यह कह सकता हूँ कि वहाँ भी पाखण्ड भरा पड़ा है , यहाँ तक कि उनकी ईमानदारी भी पाखण्ड ही है , जो शायद ज्यादा मुखर इसलिए है कि वे दूसरे को बेईमान कह सकें | हाँ , आशा तो रखनी होगी ही .. क्योंकि वही सुकून का एकमात्र रास्ता है |और आप कैसे हैं , बहुत दिनों बाद बात हुई तो अच्छा लगा और मन का थोड़ा गुबार भी निकला .. आपके तरफ तो बहुत ठंडा होगा ..

के द्वारा:

और क्या किया जा सकता है ? यही जनता जो आज अन्ना के पीछे है, जेपी और वीपी के साथ भी यही थी । भारतीय जनमानस परम्परागत रूप से आशावादी है । कहा जाय तो आशावाद हमारे जीवनदर्शन का एक अभिन्न अंग है । एक सीमा से अधिक हिंसा हमें कभी नहीं सुहाई, अन्यथा आज़ादी की लड़ाई में गरम दल की योजनाएं फ़्लाप नहीं हुई होतीं, न ही सुभास चन्द्र बोस को एक रहस्यमय वातावरण में विलुप्त हो जाने को अभिशप्त होना पड़ता । जिन देशों के संस्कार इतने सहिष्णु नहीं हैं, वहां कोई भी आन्दोलन देखते ही देखते क्रान्ति में परिणत हो जाता है, और जनता आर-पार की लड़ाई लड़ कर अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेती है । दुर्भाग्य से हम ऐसा कभी नहीं कर पाएंगे । हम सिर्फ़ चुनावों में ही कुछ कर पाने की क्षमता रखते हैं, जिसमें किसी ठोस आधार वाले ईमानदार विकल्प के अभाव में बार-बार ठगा जाना ही हमारी नियति बन चुका है । आभार !

के द्वारा:

श्रद्धेय शुक्ल जी, मेरे व्यक्तिगत विचार से अन्ना या किसी भी सामाजिक धार्मिक संगठन-व्यक्तित्व के द्वारा प्रेरित वर्तमान दौर के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को न तो भटकाव के नज़रिये से, और न ही राम-बाण फ़ौरी औषधि के नज़रिये से देखे जाने की ज़रूरत है, वरन एक दीर्घकालिक और अनिवार्य निवारण-मंत्र के रूप में मान्यता दी जानी चाहिये, जिसका निरन्तर जाप ही भ्रष्टाचार अथवा भ्रष्ट व्यवस्था से छुटकारे का एकमात्र उपाय है । भ्रष्टाचार तो कमोबेश चीन जैसे सख्ती पसन्द देश में भी विद्यमान है, जो सभी जानते हैं । परन्तु हमारे देश का भ्रष्टाचार चौथे स्टेज को भी पार कर चुके कैन्सर की स्थिति में है, जो एकाध खुराक़ वाले कीमो या रेडियोथेरेपी से क्योर होने वाला नहीं है । शीर्ष पदों पर आसीन भ्रष्टाचारी अब काफ़ी हद तक ढीठ भी हो चुके हैं, बेहयाई की सभी हदें लांघते हुए । उन्हें अब जनता या लोकशाही को नियंत्रित करने वाली किसी भी शक्ति की कोई परवाह नहीं रह गई है, क्योंकि यथास्थितिवादी बने रहने का प्रश्न अब उनके अपने अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बन चुका है । ऐसी स्थिति में विरोधी आन्दोलनों का ज़िद्दी स्वरूप और निरन्तरता उतनी ही आवश्यक-अपरिहार्य प्रतीत होती है, जितनी कि लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष का अस्तित्व में बने रहना । अन्ना यदि ज़िद्दी और आग्रही नज़र आ रहे हैं, तो उनकी ज़िद की आवश्यकता समसामयिक है, इस तथ्य को समझना होगा । साधुवाद !

के द्वारा:

आपके कथन ' आज की सबसे बड़ी और फौरी आवश्यकता मुद्रास्फिति पर काबू करने और खाद्यान की कीमतों को नीचे लाने की है | ' के सन्दर्भ में मुझे कहना है कि महंगाई का अर्धसत्य First Published:10-11-11 08:41 हिंदुस्तान दैनिक, दिल्ली, नवम्बर 11 , 2011 सरकार का यह कहना कि देश में बढ़ती अमीरी के कारण महंगाई बढ़ रही है, अर्धसत्य है। यह सच है कि इस वर्ग की क्रय-शक्ति असीमित है, और महंगाई बढ़ने से इस वर्ग को कोई असर नहीं पड़ता है। बचा हुआ सत्य है कि देश की 65 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे या गरीबी रेखा के आस-पास है। यही वर्ग महंगाई बढ़ने से पीड़ित है। पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर कहा जा रहा है कि इसे नियंत्रण मुक्त करके बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है। सब जानते हैं, बाजार की शक्तियां कितनी क्रूर होती हैं। आम आदमी को बाजार के भरोसे छोड़ देना कहां तक न्यायसंगत है? इस बाजारू व्यवस्था में आम आदमी के लिए क्या जगह बची है? क्या प्रशासन को बाजार के भरोसे छोड़ दिया जाएगा? ऐसे में फिर सरकार की आवश्यकता क्या है? जाहिर तौर पर, सरकार अपनी जिम्मेदारी बाजार पर नहीं छोड़ सकती। पूंजीवाद विफल हो रहा है। ग्रीस इसका ताजातरीन उदाहरण है। हमें इससे सबक लेना चाहिए। एस. शंकर सिंह singhsshankar@gmail.com

के द्वारा:

आदरणीय सर जी .....सादर प्रणाम ! नमस्कार ! शुक्रिया ! स्वागत ! आदर ! अभिनन्दन ! और आभार ! देश के लोग अन्ना हजारे जी के साथ है .... उनकी टीमे तो बनती और बिगड़ती रहेंगी ..... काश आज संजय गांधी जीवित होते तो देश की आबादी कितनी कम हो गई होती और आबादी के मुकाबले में हमारे संसाधन भी प्रचुर मात्रा में होते ..... कआपकी सभी बातो से सहमत हूँ ..... लेकिन क्या सभी समस्याओं के लिए सरकार ही जिम्मेवार है ?.... क्या अन्ना टीम ही समस्याओं को दूर कर सकती है ?..... क्या हम सबका कोई भी फर्ज और जुम्मेवारी इस देश और समाज के प्रति नहीं बनती है या फिर बची ही नहीं है ..... अगर अन्ना जी कुछ करे तो ही हम उनके पीछे चलेंगे ..... अगर अन्ना जी अपना मुद् बदल ले +अपना एजेंडा बदल दे तो क्या पूरे देश में और कोई भी इस मुहीम को चलाने वाला नहीं है .... मुबारकबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/11/राजकमल-इन-पञ्चकोटि-महामण/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अरुण कान्त शुक्ला्जी आप अन्ना टीम को धूल मानते हो तो धूल ही सही । पानी न हो तो धूल भी काम में आती है हाथ साफ करने के लिये, जब हाथ किचड से खराब होते हैं । आप ने जो बातें कही उस के अनुसार तो देश में किचड साफ करे ऐसा शुध्ध पानी ही नही है । तब तो धुल से ही काम चलाना पडेगा, किचड जो साफ करना है । हाथ जरूर धुलवाले होंगे लेकिन किचड से धुल अच्छी है । जब शुध्ध पानी का इन्तजाम होगा तो धुल भी साफ हो जायेगी । भ्रष्टाचार एक बडा मुद्दा है । ईस से जुडा कोइ भी लेख या तो ईधर होता है या तो उधर । न्युट्रलता का दावा करनेवाला उधर ही हो जाता है पाठक की नजर में । आप सिनियर लेखक हो मैं आपको अधिक क्या बता सकता हुं । आदमी ईधर का है या उधर का । वो तय करने का एक तरिका मैने बताया था, मेरे ईस लेख में ---कबड्डी कबड्डी---

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय अदित्य जी.... आपने निश्चित ही उल्लेखनीय लेख लिखा है.... पर यहाँ एक कमी है जो हर एक आम आदमी मे है .... जब आप जैसे अनुभवी बुद्धिजीवी कुछ लिखते हैं तो वो हमारे जैसे युवाओं के लिए एक संदेश सा होता है.... पर इस बार कुछ भ्रम मे हूँ की क्या आपका संदेश कुछ भ्रामक है या मैं ही अनावश्यक भ्रम पाल रहा हूँ.... पूरे मीडिया और कॉंग्रेस नेताओं ने शुरू से ही टीम अन्ना को अपना निशाना बनाया है..... कभी अन्ना के फौज से भगोड़ा होने को मुद्दा बनाया गया तो कभी अरविंद केजरीवाल के बकाया को लेकर ..... तो कभी किरण बेदी के अधिक बिल लेने को ....... हर बार हमारे आदरणियों ने आगे आकर हमें ये समझाना चाहिए था की हमें इस तरह की बातों को अनदेखा करके केवल आंदोलन की सफलता की बात करनी चाहिए। पर ऐसा हुआ नहीं ......... हमारे सम्मानित बड़े ही इस आंदोलन की कमियाँ खोजने लगे...... ये जानते हुए भी की इसके लिए सरकार लगी ही है..... मेरी कुछ जिज्ञासाएँ हैं....... जो मैं आपके माध्यम से दूर करना चाहता हूँ...... 1. क्या यदि किसी को कोड़ हो तो वो कोड़ से बचाव के अभियान मे सहायता नहीं कर सकता.... 2. क्या कैंसर से पीड़ित व्यक्ति द्वारा कैंसर का अस्पताल खोले जाने का विरोध होना चाहिए....... आखिर क्यों यहाँ पर कोई ये नहीं कहता की हम इस मुद्दे पर अन्ना के साथ हैं की भ्रष्टाचार दूर हो........ और साथ ही हम सरकार के साथ भी है की वो लोकपाल को इतना मजबूत बनाए की यदि अन्ना भ्रष्ट हों तो उन्हें भी पूरी सजा मिले.......... अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी पर निशाना साध कर सरकार साबित क्या कर रही है ......... यही की उसके पास ऐसा कोई कानून नहीं है जो केजरीवाल से 9.3 लाख रुपये निकलवा सके ......या किरण बेदी को सजा दे सके..... कुछ लोग कहते हैं की कानून बनाने से भी कभी भ्रष्टाचार दूर होता है........ तो मैं हमेशा उनको ये कहता हूँ.... की अगर कानून न हो तो इस दुनिया मे किसी का कोई दुश्मन ही न हो...... क्योकि तब लोग दुश्मन को दुश्मन बनने से पहले ही मार डालें ...... क्योंकि कानून है इसी लिए लोगों के दुश्मन भी है...... और कई बार ये दुशमन भी अपनी छोटी छोटी लड़ाइयों को भुला कर फिर अच्छे दोस्त भी बन जाते हैं...

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

बड़े परिश्रम, लगन और तन्मयता से आपने टीम अन्ना की कमियों को उधेडा है. बधाई ! हमलोग के भोजपुरी में एक कहावत है "चिल्लर का चहू गिनना" और इसी के समकक्ष एक इससे थोड़ी विद्रूप कहावत और है "चूची में हाड़ बिनना". आपका लेख इन दोनों कहावतों के मानदंड पर बिलकुल खरा उतरता है. पुनः बधाई !! लेकिन डॉ. एस. शंकर सिंह जी ने जो टिप्पणी की है कि पहला पत्थर मारने वाला आज वर्तमान में कौन है, वही मैं भी जानना चाहता हूँ. अगर आपको जानकारी हो तो आप बताएं और अगर कोई नहीं है तो क्या हम यूं ही भ्रष्टाचार झेलते रहें, महंगाई कि चक्की में पिसते रहें. आपके सम्पूर्ण लेख का उपसंहार तो यही नज़र आता है. अगर ऐसा नहीं है तो कृपया बताने का कष्ट करेंगे.

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

हर व्यक्ति में कमियाँ होती हैं. अन्ना टीम के लोगों में भी हैं. To err is human. इससे भ्रष्टाचार विरोधी जन लोकपाल आन्दोलन की विश्वसनीयता को निश्चित रूप से आघात पहुंचा है. जो कुछ भी अन्ना टीम के लोगों नें गलत किया उसके लिए उन्हें सजा मिलनी चाहिए. टीम अन्ना पर कीचड उछालने का काम ' चूंकि सरकार की कमीज़ कीचड में सनी हुई है इसलिए टीम अन्ना की कमीज़ ज्यादा सफ़ेद क्यों होनी चाहिए ' के प्रयत्न जैसा ही लगता है. अकबर बीरबल के किस्से के तौर पर कहा जाय तो यह मौजूद रेखा के समानांतर एक दूसरी रेखा खींचने जैसा है. ज़रुरत समझी जाय तो एक नयी म गठित की जाय. लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी यह आन्दोलन अंतिम निष्कर्ष तक चलता रहना चाहिए. नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है. प्रश्न फिर भी वही उठेगा कि क्राइस्ट की कहानी के अनुसार पहला पत्थर मारने वाला आदमी कहाँ से आयेगा. क्या ऐसा आदमी होता भी है. आप के पास क्या समाधान है.

के द्वारा:

श्रद्धेय शुक्ल सर, आपने अपने लेख में बिलकुल उचित शंकाएँ जताई हैं। एक वो वक़्त याद आता है जब अटल बिहारी वाजपेयी ने बतौर विदेश मंत्री संयुक्त राष्ट्र में अपना भाषण हिंदी में दिया था। अधिकतर अवसरों पर उनके द्वारा हिंदी का प्रयोग किया जाता था। आज हिंदी बोलने में हिंदी भाषियों को ही शर्म आती है। माँ को अपनी माँ बताने में शर्म कैसी। भाषाओँ का जानकार होना अनुचित नहीं है पर अपनी राष्ट्रभाषा का तिरस्कार करना सर्वथा अनुचित है। आपने इस समस्या के मूल कारणों पर प्रकाश डाला है जो इसे स्पष्ट करता है। आपके विचारों से सहमत हूँ कि इसे बचाने के लिए राजनैतिक संघर्ष भी आवश्यक है। भाषा के विकास के नाम पर उसमें अनर्गल शब्द समाहित किये जाना भी बंद होना चाहिए। साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

के द्वारा: aksaditya aksaditya

के द्वारा: aksaditya aksaditya

आदरणीय शर्माजी , आपका कथन सत्य है | मैंने यह बात लेख के प्रारंभ में ही स्पष्ट की है और यह भी कहा है कि कोई भी राजनैतिक दल दूध का धुला नहीं है | चूंकि , लेख का विषय मनमोहनसिंह की निष्ठा के बारे में है और उन पर सोनिया के प्रति निष्ठा रखने के आरोप लगाए जाते हैं , मैंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि ये आरोप केवल भारत में सत्ता प्राप्त करने की राजनैतिक दलों की आपसी लड़ाई है | जब बीजेपी नीत एनडीए की सरकार थी , तब उस पर संघ के अनुसार चलने के आरोप लगते थे , पर वास्तविकता यह है कि राष्ट्रवाद के तमाम नारों के बावजूद वह संघ हो या भाजपा , हैं अमरीका परास्त ही | 1991में जिस रास्ते पर भारत को डाला गया है , वह उसे अमरीका का पिछलग्गू ही बनाता है | आपके विचारों के लिये बहुत बहुत धन्यवाद |

के द्वारा: aksaditya aksaditya

आदेनीय दुबे जी , किसी मुद्दे के महत्वपूर्ण होना या न होना तो अलग अलग लोग अपनी अपनी समझ के अनुसार निर्शारित करेंगे , इसलिए उस पर मुझे कुछ नहीं कहना | जहां तक मुआवजे का प्रश्न है वह राज्य शासन ने घोषित नीती के अनुसार ही दिया है , शोक जताना भी , उसी प्रक्रिया का हिस्सा है | ये दोनों काम , जब कोई एक्दीसेंत होता है , उसमें भी रूटीन तरीके से किये जाते हैं | सवाल भाजपा की सरकार होने पर भी प्रश्न खड़े करने का नहीं है , क्योंकि वह प्रदेश की निर्वाचित सरकार है , कोई इसे माने या न माने | पर जिस किसी भी दल की सरकार हो , आलोचनाएं तो उस दल विशेष के प्रतीक गुणों के साथ ही की जाती हैं , इसीलिये कारगिल का उल्लेख हुआ | मेरा लेख माओवाद के पैदा होने के संबंध में नहीं था | वैसे जिन नीतियों के कारण देश में माओवाद पैदा हुआ है , भाजपा उँ नीतियों पर ही कहलाती है | और भाजपा ही क्यों , भारत के कमोबेश सभी राजानीतिक पार्टियां उन्हीं नीतियों पर चलाती हैं | वह एक अलग विषय है | सेना के उपयोग करने या न करने का विषय बहुत गंभीर है | उस पर यहाँ चर्चा न जरूरी है और न ही शायद हम उपयुक्त पात्र | आपके कमेन्ट के लिये धन्यवाद |

के द्वारा: aksaditya aksaditya

आदरणीय शुक्ल जी, ये उतना भी महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है जितना बड़ा आप दिखा रहे हो,पहले आप स्पस्ट करे की कचरे के साथ लाया गया या फिर उस गाड़ी पर लाया गया जिस पर दो या तीन दिन पहले कचरा धोया गया था ,राज्य सरकार की शहीद जवानों के प्रतिबद्धता को आप इस तरह से ख़ारिज नहीं कर सकते है दोनों जवानों को मरणोपरांत १ लाख रूपये का मुवायजा घोषित हुआ है खुद मुख्यमंत्री ने शोक जताया,विरोध कीजिये इस बात का की हमारे गृहमंत्री ने मओवादियो के विरुद्ध सेना का उपयोग की घोसना के पीछे क्यों हट गए , मओवादियो पर सेना को हवाई हमलो की इजाजत क्यों नहीं देते ,उससे बड़ा जवानों का अपमान मुझे आपके लेख के इस लाइन में नजर आता है "कारगिल के शहीदों की याद में हर साल टसुए बहाने वाली भाजपा की राज्य सरकार " आपकी दिक्कत यही है की वहा पर भाजपा की सरकार क्यों है ,लिखिए इस बात पर की रमण सरकार की वह कौन सी नीतिया है जिस वजह से वहा के लोगो ने हथियार उठाने पर मजबूर हुए ,क्योकि आप जानते है की ये सभी माओवादी अजित जोगी के समय से पहले के है .

के द्वारा:

आपका लेख पढ़ा शायद आपके पहले भाग से ही यह समझ लेना की स्वामी जी एक नौसिखिये आन्दोलन कारी और अन्ना हजारे एक निपुण खिलाडी हैं कोई मुशिकिल नहीं है और जहाँ तक सोम्यता और पारदर्शिता का सवाल है भले ही मैदान को योग के लिए बुक किया गया हो लेकिन तमाम इश्तेहारों में साफ़ साफ़ सत्याग्रह और आन्दोलन का जिक्र हर शहर में देखा जा सकता है साथ ही घमंड इत्यादि की बात है तो यह अपनी अपनी दृष्टिकोण की बात है एक साधू द्वारा देश हित के कार्य में इतन्नी बड़ी तादाद में जन समूह को इकठ्ठा कर पाना आसान बात नहीं है और अगर किसी के गर्व को आप घमंड कहना कहते हैं तो.....यह लोकतंत्र है इस देश में और कितने ही ऐसे साधू संत महात्मा हैं जिनके पास एक बहुत बड़ा जन समूह है लेकिन सभी अपना धन बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं कोई आगे नहीं आया और उनके धन का कोई हिसाब भी नहीं पूछता आज आप साईं बाबा के हिसाब को ही देख लें तो आपका अंदाज़ा हो जायेगा मेरा प्रश्न है की एक व्यक्ति जो निश्वार्थ भाव से कुछ करने की चाह रखता है तो लोग उसकी टाँगें खीचना शुरू कर देते हैं खुद में दम नहीं औरों को सबक पढ़ने लगते हैं क्या में और आप कुछ १० -१५ आदमियों को लेकर यह सब कर सकते हैं जब एक लाख के करीब लोगों का यह हाल हुआ है तो हमारा क्या हो सकता है ? अब दुसरे भाग के बारे में बात करें तो आपकी भाषा बिलकुल गैरजिम्मेदार दिग्विजय से प्रेरित लगती है और इसका अहसास आपको तभी हो सकता है जब किसी रात आपकी आँख खुले और आपके सामने बहुत सारे गुंडे खड़े हों तब आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? शायद आप इस बारे में अपने परिवार के साथ बैढकर सोच पायें की आप भी उचल कूद करते या भागते ? यहाँ में बताना चाहूँगा की एक राजनितिक पार्टी अगर कोई इस तरह का अनशन करती है तो उसे इस तरह की कारवाही का अहसास जरूर होता है लेकिन मेरे और आप जैसा इंसान जो सीधे सादे मन से बैठा है वह इस तरह के आकस्मिक हमले के बारे में भला कैसे सोचेगा और जहाँ तक हरिद्वार में प्रतिक्रिया की बात है तो बेवजह एक बर्बरता पूर्वक जान लेवा कारवाही से अपनी जान बच जाने के बाद के बाद किस तरह का अहसास होता है यह एक इंसान जब अपने पर बिताती है तभी जान सकता है मैं आपसे प्रार्थना करना चाहूँगा की चूँकि आप इस हफ्ते के ब्लोगेर ऑफ़ थे वीक हैं तो सपष्ट है की आप एक अच्छे लेखन का अनुभव भी रखते होंगे तो क्यों न आप इन सब घटनायों के बारे में "अगर आप स्वामी जी की जगह होते तो क्या करते " हम लोगों को समझाएं की वास्तव में क्या होना चाहिए था ? माफ़ी चाहूँगा आपने बल्क्रिशन के पत्र का जिक्र तो किया लेकिन उसमें क्या लिखा था और किस तरह का समझोता था अगर हमारा भी ज्ञान बढा देते तो अच्छा होता क्या लोगों के कंधे पर बैठे बाबा ने खुद को गिरफ्तार करवाने की बात को दिग्विजय, कपिल सिब्बल खा गया या फिर आपके गले से बात उतरी नहीं और बाबा ने यह क्यों कहा की ६ तारीख तो अभी आई नहीं आपके इस विचार पर हैरानी होती हैं की आप जैसा एक अनुभवी इंसान कहता है " कि जनतंत्र में अवतार और बाबा नहीं, जनों का आंदोलन ही परिवर्तन और सुधार ला सकता है" कौन करेगा यह सब? क्या सोच रहें हैं? क्या कोई राजनितिक पार्टी? सोनिया, राहुल या बी जे पी ? भला 'आ बैल मुझे मार ' कौन करना चाहेगा ? क्या आप करेंगे ? कितने लोग आपके पीछे आयेंगे. आप कहना क्या चाहते हैं की कोई कुछ न करे चुप चाप बैठे रहें मैंने और आपने तो कुछ किया नहीं तो कमसे कम जो कर रहा है उसे तो करने दो आखिर इसमें तकलीफ कैसी है साम्प्रदायिकता की बात शायद आपने इसलिए नहीं की क्योंकि शायद आपकी खुद की जुबान भी इसे कहेने में लडखडा रही होगी क्योंकि अब तो कांग्रेस परिभाषा की आड़ में साम्प्रदायिकता कर रही थी अब खुले तौर पर सम्प्रदियाकता पर चल रही है लेकिन भ्रस्ताचारियों को अपनी वफ़ादारी दिखाने के लिए भले ही अनमने मन से आखिर बोल तो दिया ही अपने वोते बैंक को भी हिलता देख इस आन्दोलन को कांग्रेस समथकों द्वारा आर एस एस से जोड़ना बहुत बड़ी मजबूरी है क्या करें इस समय अगर मैं ये कहूँ की जहाँ स्वामी जी अपने और जनता के उप्पर किये अत्याचार से विचलित और दुखी हैं वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस बोख्लाई और पगलाई सी लग रही है और ठीक जिस तरह स्वामी जी ने शुरू में हरिद्वार में गुस्से में आकर प्रतिक्रिया व्यक्त की थी ठीक उससे भी बढ़कर कांग्रेस अपनी झल्लाहट और खुन्दस अभी भी निकल रहे हैं यह राजनीती का सबसे निचला स्तर दीखता है और अब शायद वोह दिन दूर नहीं की जिस तरह रुस्सिया में लेनिन वाद का खातमा आज़ादी के बाद किया गया उसी तरह तोड़ो और राज करो का भी अंत निकट है और अगर ऐसा हुआ तो ऐसे लोगों को या समर्थकों को देश द्रोही भी अगर कहा जाने लगे तो भी शायद अति शियोकती न होगी

के द्वारा:

हम बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलता है अगर गलत बोलोगे सब आपकी बुराई करेगे हमेशा सम भाव मे लिखिए आप कोइ भी हो लेकिन आप निशपक्ष नहीं लगते बाबा के निगेटिव पोईंट तो आपकी आँखों कानो ने देखा सुन लिए जो १% है ९९% पोसीटिवे पोईंट नाही दिखे नाही सुनी जब सारा देश भ्रस्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा है और स्विट्जरलैंड में पड़े काले धन को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने की मांग कर रहा है तो ऐसे नाजुक वक्त में सोनिया गाँधी द्वारा राहुल गाँधी,सुमन दुबे [राजीव गाँधी फाउंडेशन ],विसेंट जार्ज , राबर्ट बढेरा , और लगभग १२ अन्य लोग के साथ स्विट्जरलैंडमें ८ जून को एक निजी बोम्बर्दिएर जेट से ज्यूरिख [स्विट्जरलैंड ] जाना क्या दर्शाता है...???!!!! आपके या आपके पालतू लोगो पास जवाब है कोइ … ८ जून से आज १५ जून हो गयी किशी भी मीडिया वाले ने ये समाचार दिया और मीडिया सोनिया गाँधी के बारे क्यों बताये जो हर मिडीया वाला अकूत संपत्ति इश परिवार से लेता है कुछ नेता लोकतंत्र कि दुहाई देने लगे जिन्हें लोकतंत्र कि परिभाषा तक नहीं मालूम और मिडिया के जरिये लोगों को बरगलाने कि कोशिश करते दिखते है उनका कहना था कि हम जनता के चुने हुए नेता हैं ! क्या इसका मतलब ये हुआ कि जनता ने उन्हें लूटने का अधिकार दे...और कुछ सुनना हो तो जबाब देदेना

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आदरणीय डा. साहब , बहुत पहले मैंने इन्दुकांत जी के दो या तीन लेख पढ़े थे | वे शायद बहुत पहले सीपीआई से जुड़े थे |मुझे ठीक से जानकारी नहीं है | मैंने अपने जबाब के पहले हिस्से में वामपंथ किन आधारों पर देश की राजनीति में काम कर रहा है , उसका अपनी समझ के आधार पर खुलासा किया था | मैंने जो जबाब आदरणीय शाही जी को दिया है , जिसे आपको भी पेस्ट किया है , वह आज के परिस्थितियों के बारे में मेरी समझ है | हम फौरी परिस्थितियों के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकते , वह न केवल जल्दबाजी होगी बल्कि उचित भी नहीं होगा | संसदीय प्रजातंत्र में वाम को भी अनेकों ऐसे समझौते करना पड़ते हैं , जिन्हें शायद परिस्थितियाँ उनके अनुकूल होने पर वे कभी न करें | मैंने कहा कि , केवल राजनीतिक दलों के सामने ही नहीं , जनता के सामने भी हमेशा बड़ी बुराई और छोटी बुराई में से एक को चुनने का विकल्प रहता है और हमेशा सभी छोटी बुराई को चुनना पसंद करते हैं | दरासक छोटी बुराई को चुनने का मतलब है , समस्या के निदान का अल्पकालिक ( short term ) रास्ता | मैंने प्रारंभ में ही कहा था कि इतिहास में घटने वाली घटनाओं में लगाने वाला समय मनुष्य के जीवन की अवधि से बहुत ज्यादा लंबा होता है | इसलिए सामान्य व्यवहार में भी हम सभी संक्षिप्त रास्ता अधिक अपनाते हैं | वही अभी भी हो रहा है | किन्तु , महत्वपूर्ण यह है कि आगामी तीन से चार दशकों तक संक्रमण का समय है | इस दौरान , यः तो कोई मुद्दा ही नहीं है कि वामपंथ कैसा है या पूंजीवाद बना रहेगा या नहीं , मुद्दा यह है कि , कौन सी और कैसी व्यवस्था इसे विस्थापित करेगी | इसके लिये वामपंथ को ही क्या विश्व के पूरे जनसमुदाय को बिना समझौते के ठोस संघर्ष करना होगा ताकि पूंजीवाद को वस्थापित करने वाली व्यवस्था तुलनात्मक रूप से अधिक लोकतांत्री और समतावादी हो | अल्पकालिक रास्तों पर चलकर शायद ऐसा होना संभव नहीं होगा | इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि इस मध्य सभी राजनीतिक लड़ाईयों का उद्देश्य फिलवक्त धनिकों के तरफ झुके हुए संतुलन को विश्व के आम लोगों की तरफ झुकाना होना चाहिये | जो लोग इस व्यवस्था ( इसके चारित्रिक गुणों , श्रेणीबद्ध समाज , ध्रुवीकरण और शोषण ) को बनाए रखते हुए परिवर्तन ( आज की उनकी भाषा में क्रान्ति ) की बात कर रहे हैं , वे दरअसल पूंजीवाद से भी बदतर किसी व्यवस्था की और समाज को ले जाना चाहते हैं | यहाँ यह याद रखना होगा कि संक्रमण की इस अव्यवस्था में जो भी संघर्ष हो रहे हैं , उनके परिणामों को टाला नहीं जा सता | इन संघर्षों के अच्छे और बुरे सभी परिणामों को झेलना ही पड़ेगा | हमारे पास एक अच्छी व्यवस्था को प्राप्त करने के चांस फिफ्टी - फिफ्टी ही रहेंगे | कोई इसे निराशाजनक कह सकता है , पर मेरे हिसाब से , एक बहुत बड़ी सम्भावनाओं के द्वार पर विश्व जनसमुदाय खड़ा है , इसमें उसे सफल होना चाहिये | ये मेरे विचार हैं , वास्तविकता तो सामने आने पर ही पता चलेगी |

के द्वारा: aksaditya aksaditya

प्रिय शुक्ल जी, सादर नमस्कार. आप कहते है यू पी ए - I के निर्माण में वाम पक्ष ने कांग्रेस को समर्थन नीतियों नहीं बल्कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर दिया था. मेरी समझ में कांग्रेस की नीतियों और न्यूनतम कार्यक्रम में कोई अंतर नहीं है. कांग्रेस का न्यूनतम कार्यक्रम है देश में सामंतवादी फासीवादी सल्तनत की स्थापना करना और भ्रष्टाचार द्वारा खूब धन कमाना. इस यू पी ए - I की स्थापना में वामपक्ष का सक्रिय योगदान रहा है. जो विषबेली बोई गई थी आज वह विशाल वृक्ष बन गई है. जो भस्मासुर पैदा किया गया उसके दुष्परिणाम तो हम सबको भोगने ही पड़ेंगे. बोया पेड बबूल का तो आम कहाँ से खाय. आपको मुलायम सिंह और लालू यादव की संकुचित जातिवादी राजनीति में अनेक गुण नज़र आते हैं. अब ये मत कहियेगा कि ये लोग गरीब मजदूरों और किसानों के प्रतिनिधि हैं. असलियत में ये लोग जिन जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं वे ग्रामीण परिदृश्य में धनाढ्य, money और muscle poer वाले हैं. गावों में यही लोग गरीबों और दलितों का शोषण करते हैं. यह आग बात है कि वामपक्ष को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कांग्रेस और इन शोषणकर्ता जातिवादी बैसाखियों की ज़रुरत है. वामपक्ष को बिना बैसाखियों के चलना सीखना पड़ेगा. बैसाखियों के सहारे चलने की आदत पड़ जाय तो वामपक्ष अपने पैरों पर कभी खड़ा नहीं हो पायेगा. प्रसंगवश यहाँ मैं यह बता देना उचित समझता हूँ कि वामपंथी विचारधारा से मेरा परिचय अत्यल्प ही सही, लेकिन है अवश्य. नवम्बर सन 1975 - फरवरी 1977 तक मैं जर्मनी में रहता था. वहाँ मेरी मुलाकात एक भारतीय सज्जन से हुई. जबतक मेरे बच्चे नहीं आये थे, तब तक कुछ दिन हम साथ साथ रहे. वे एक अच्छे दोस्त थे. वे मार्क्सिस्ट - लेनिनिस्ट विचारधारा के थे. उनसे मेरी लम्बी बहस होती थी. उनके और आपके नाम में काफी साम्य है. आपका नाम अरुण कान्त शुक्ल है. उनका नाम था इंदु कान्त शुक्ल. चूंकि आप वामपंथी विचारधारा के हैं, इस कारण मैं समझता हूँ आप उन्हें अवश्य जानते होंगे. इंदु कान्त शुक्ल जी इंग्लिश में M A थे. बड़े विद्वान् थे भारत की वामपंथी पत्रिकाओं Frontier, Economic and Political Weekly, Seminar में अक्सर लिखते थे जो मुझे पढ़ने को मिलती थीं. उनके लेख कम से कम आपने अवश्य पढ़े होंगे. शुक्ल जी इंदिरा गाँधी और कांग्रेस को फासिस्ट कहते थे. बाद में शुक्ल जी अमेरिका चले गए थे जहां दुर्भाग्यवश पिछले साल 80 साल की उम्र में उनका देहावसान हो गया. विचारधारा के धरातल पर मैं Alexander Pope की एक Poem उद्धृत करना चाहूंगा. For the forms of Govt let fools contest But, Whatever is best administered is best साभार

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के द्वारा: maninder maninder

आदरणीय डा. साहब , मैंने यह नहीं कहा था कि वाम दल काँग्रेस को कांग्रेस की नीतियों के तहत समर्थन देते हैं | कृपया मेरे कमेन्ट को पुनः पढ़ें | मैंने यः कहा था कि वामदल , वामदलों (उनकी नीतियों ) की नीतियों के आधार पर मुद्दा आधारित समर्थन करते हैं , जिसका खुलासा भी मैंने किया था कि \" उनके कार्यक्रम के अनुसार उनका प्रथम लक्ष्य देश में जनवादी क्रांती याने धर्मानिरपेक्ष और लोकतांत्रिक दलों का मोर्चा बनाकर एक जनवादी सरकार की स्थापना है और फिर उसके तहत पूंजीवाद का विस्तार , जिससे उत्पादन औद्योगिक और कृषि दोनों , अपने चरम पर पहुंचे | इसीलिये वे केवल कांग्रेस नहीं , भारत के साम्प्र्दायोक दलों को छोड़कर मुलायम , लालू , चंद्राबाबू सभी के दलों के साथ तालमेल करते रहते हैं | यह तालमेल मुद्दों के आधार पर होता है | यूपीए के पिछले कार्यकाल में भी उन्होंने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर समर्थन दिया था\" | भारत में वाम के कई धड़े हैं | इमरजेंसी में एक धड़े ने समर्थन किया था , सबने नहीं | आप जिसे उनकी अवसरवादिता कह रहे हैं , याने मुलायम ,लालू के साथ सहयोग , वह मैंने बताया कि उनकी जनवादी क्रांती की अवधारणा को मूर्त रूप देने की रणनीति के तहत है | छूनकी आम लोग उनके पार्टी कार्यक्रम के बारे में उतनी जानकारी नहीं रखते , इसलिए उन्हें वह अवसरवादिता लगती है | राजनीति में हमेशा सभी दलों के सामने , चाहे वे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी , उस समय , उनके सामने उपस्थित बड़ी बुराई और छोटी बुराई में से एक को चुनने की मजबूरी रहती है | वाम दलों को , जैसा में समझता हूँ , कांग्रेस छोटी बुराई लगती है | देश की जनता भी चुनावों के समय ऐसा ही करती है | चुनावों के बाद बनाने वाले गठबंधनों में भी ऐसा ही होता है | इसमें अलग अलग राज्यों , क्षेत्रों की जनता अपने हिसाब से अलग अलग व्यवहार करती है | ऐसा ही राजनीतिक दल भी अलग अलग राज्यों में अलग अलग व्यवहार करते हैं | इसे साधारण भाषा में \"राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता\" या अवसरवादिता , जनता और स्वयं राजनैतिक दल भी कहते हैं | जहां तक वामदलों के विकल्प के रूप में विकसित नहीं हो पाने की बात है , इसके अनेकों कारण हैं | अभी भारत में उस तरह से कोई किसी का विकल्प है भी नहीं | यह सच है कि इसी व्यवस्था में काम करते करते अनेक दोष वामदलों में भी घर कर गये हैं , पर वे तुलनात्मक रूप से कम ही हैं | यह भी सच है कि , विशेषकर , दुनिया में भूमंडलीकरण की नीतियों को पूंजीवाद के द्वारा तीव्रता के साथ लागू करने के बाद , पूरे विश्व में मजदूर आन्दोलनों में व्यापक कमजोरी आई है | 1950 से लेकर 1970 तक का समय , द्वतीय विश्वयुद्ध के बाद के निर्माण का समय था और उसमें केवल भारत ही नहीं दुनिया के कामगारों के सभी ट्रेड यूनियनों को भारी सफलताएं मिलीं | इन्हें अर्जित करने में विश्व के तमाम देशों में वामपंथी ट्रेड यूनियनों का भारी योगदान रहा | अब जब पूंजीवाद के आक्रमण तेज हुए हैं और एकदम नए तरीके के रोजगार और नियोजन सामने आये हैं , ज्यादा नुकसान वामपंथी ट्रेड यूनियनों को ही उठाना पड़ रहा है , क्योंकि वे ही अगुआ दस्तों में थीं | यह संक्रमण का समय है और फौरी घटनाओं से कोई स्थायी राय बनाना उचित नहीं है | मैंने आपसे निवेदन किया था कि में आदेअनीय शाही जी के कुछ प्रश्नों पर अपनी स्वयं की समझ रख रहा हूँ , कृपया उसका अवलोकन करें |इस जबाब के साथ मैं वह भी पेस्ट कर रहा हूँ | मेरी अपनी धारणाएं है , उनका किसी वाद से कोई सम्बन्ध नहीं है , आदरणीय शाही जी , नमस्कार | विलम्ब से संपर्क में आ रहा हूँ , इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूँ | आपके द्वारा उठाये गये प्रश्न कि क्या भीड़ खुद अपना नेतृत्व कर लेगी ? वह कौन सा पूर्ण शलाका पुरुष अथवा आजमाई हुई विचारधारा है , जिसके झंडे और बेनर के नीचे जनता को इकठ्ठा होकर संघर्ष करना चाहिये , तो गारंटी के साथ व्यवस्था अवश्य बदल जायेगी ? , आज समाज में बैचैनी के साथ पूछे जा रहे हैं | कमोबेश , कुछ इसी तरह के प्रश्न दूसरे स्वरूप में विश्व पटल पर चलने वाले विचार विमर्शों के केंद्र में हैं , विशेषकर वर्ष 2007 की विश्व व्यापी मंदी के बाद , इन प्रश्नों पर विचार तेज हुआ है | क्या समाजवादी अवधारणा बीसवीं शताब्दी में ही खत्म नहीं हो गयी ? क्या पूंजीवाद ने समाजवादी अवधारणा को हरा नहीं दिया ? क्या वे जो अभी भी समाजवाद की वकालत कर रहे हैं , यूटोपियन नहीं है कि जो एक ऐसा स्वप्न देख या दिखा रहे हैं , जो सुखद तो है , पर , जिसके पूरे होने की कोई संभावना नहीं है | इन प्रश्नों पर दो तरह के विचार समूह सामने आ रहे हैं | दोनों यह तो मानते हैं कि वर्त्तमान (पूंजीवादी) व्यवस्था पूरी तरह सड़ चुकी है परन्तु उनके मध्य इस बात को लेकर मतभेद है कि इसे किस प्रकार की विश्व व्यवस्था बदलेगी ? एक समूह गैर पूंजीवादी व्यवस्था व्यवस्था तो चाहता है किन्तु वर्त्तमान व्यवस्था के तीनों चारित्रिक गुण श्रेणीबद्ध समाज , शोषण और ध्रुवीकरण को बनाए रखते हुए | दूसरा विचार समूह एक ऐसी व्यवस्था गैर पूंजीवादी व्यवस्था चाहते हैं , जो अभी तक कभी अस्तित्व में ही नहीं रही , एक लोकतांत्रिक और समतावादी व्यवस्था | उपरोक्त दोनों समूहों की मतभिन्नता से इतर , मैं यह विश्वास करता हूँ कि आज विश्व का जनसमुदाय वास्तव में व्यवस्थागत संकट में है और आने वाले 25 से 50 वर्षों के भीतर वह वर्त्तमान व्यवस्था के बदले में कैसी व्यवस्था चाहता है , इस मसले को सुलझा लेगा | हम निश्चित रूप से स्वयं को किसी दूसरी व्यवस्था में पायेंगे , जो वर्त्तमान व्यवस्था से अच्छी भी हो सकती है और इससे खराब भी | ऐतिहासिक रूप से अभी तक कोई भी व्यवस्था अर्थपूर्ण सन्दर्भ में न तो लोकतांत्रिक रही है और न ही समतावादी | इससे अधिक , अभी कुछ नहीं कहा जा सकता | इतिहास में परिवर्तनों की रफ़्तार से मनुष्य की जिंदगी की अवधि कम होती है | इसीलिये महत्त्व व्यक्ति का नहीं संगठन और सिद्धांतों का होता है | इसलिए किसी शलाका पुरुष के पीछे खड़े होकर आंदोलन करने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता | हम परिवर्तन के दौर से ही गुजर रहे हैं , पर ये वैसे नहीं हैं और न होंगे जैसे हमने बीसवीं शताब्दी में देखे | इसे बहुत अच्छे से वर्ष 2005 के वर्ल्ड सोशल फोरम में वेनेलुजुएला के प्रेसीडेंट शावेज ने पेश किया था | उन्हीं के शब्दों में “We have to re-invent socialism” | पर , यह वैसा समाजवाद नहीं हो सकता , जैसा हमने सोवियत संघ में देखा था | जैसे आन्दोलन अभी विश्व स्तर पर देखे जा रहे हैं , मध्यपूर्व के देशों सहित भारत में भी , उनसे तो लगता है कि यह प्रतिद्वंदिता के बजाय सहयोग पर आधारित होना चाहिये | छोटे स्तर पर यह संक्रमण का दौर है और जनता के अनेकों आंदोलन अभी दक्षिण और वाम , दोनों तरह की राजनीति से दूर स्वत:स्फूर्त तरीके के होंगे , जैसे कि पूंजीवाद की शुरुवात में 17वीं , 18वीं और 19वीं शताब्दी में भारत सहित विश्व के तमाम देशों में हुए थे , औद्योगिकीकरण के प्रारंभिक दौर में , जब नई नई मशीनों का आगमन हुआ और लोग उअनसे वाकिफ नहीं थे , उनके सामने कोई विचारधारा नहीं थी और उनके आंदोलन , अधिकाँश , स्वत:स्फूर्त और नेतृत्वविहीन या फिर स्थानीय याने स्वयं के बीच से निकले नेतृत्व के अंदर हुए थे और ऐसे आन्दोलनों से नेतृत्व , विचारधारा निकली थी | इसलिए प्रारंभ के आंदोलन का स्वरूप मशीन विरोधी था , जिसे कुछ लोग प्रगति विरोधी भी कहते हैं | जबकि , वास्तव में वे नए नए पूंजीवाद के , शोषण के नए नए तरीकों के खिलाफ , अपना जीवन बचाने और उसमें सुधार करने के आंदोलन थे | तात्कालीन और आज की परिस्थितियों में फर्क शोषण के बदले हुए तरीकों का है | मशीन के साथ साथ , आज जमीन की लड़ाई भी है , उचित मुआवजे की लड़ाई भी है | बाकी पूंजीपतियों के द्वारा बेतहाशा मुनाफ़ा बटोरना , आवाम को देश की आय से उचित हिस्सा नहीं देना , उनकी बुनियादी जरूरतों को बाजार का हिस्सा बनाना , जैसे पानी , हवा और प्रकृति का अंधाधुंध दोहन , सब जैसे का तैसा है | उस समय विचार धारा नहीं थी और आज कमोबेश सभी विचार धाराएं नवउदारवाद के सामने परोक्ष और अपरोक्ष समर्पण कर चुकी हैं | इसीलिये आज हो रहे आन्दोलनों के स्वरूप में बदलाव आया है | इसका प्रमाण किसानों के वे आंदोलन हैं ,जो बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के हाल में लड़े गये हैं और किसानों ने राजनीतिज्ञों को भगा दिया | ऐसा ही हमने अन्ना के आंदोलन में भी देखा | अन्ना को किसी को लामबंद करने की आवश्यकता नहीं पड़ी , लोग स्वयं लामबंद होते गये | यह समझने में अभी सभी को वक्त लगेगा कि राजनीति से दूर का मतलब , राजनीतिविहीन नहीं है | मतलब है कि वर्त्तमान राजनीति को नापसंद करना , चाहे उसका प्रकार कैसा भी क्यों न हो | यह एक नयी राजनीति के शुरुवात के लक्षण हैं | अब इस सबके परिपक्व होने तक ज़िंदा रहना या न रहना , अपने बस में तो नहीं है | और फिर रहे भी तो उसमें हस्तक्षेप करने लायक रहेंगे या नहीं , कौन बता सकता है ? इंतज़ार और वर्त्तमान में तर्कपूर्ण , विवेकपूर्ण , व्यक्तिवाद से दूर , लोकतांत्रिक और सबको साथ लेकर चलने वाले विचारों को ज़िंदा रखना , उनके लिये जोर देना और उनको संघर्ष में बदलने में योगदान देना और आगे की पीढ़ी को उसके लिये तैयार करना तथा उन हालातों को उसे सौंप देना ही फौरी काम हो सकता है | सभी की यह धारणा रहती है कि भ्रष्टाचार से अनेक समस्याओं का जन्म होता है | यह सही भी है | पर, भ्रष्टाचार स्वयं अनेक समस्याओं से पैदा होता है | ” A system ( society) which encourage greediness , may it be in the name of competition or development of individuals , in it’s members , gives birth to corruption” | A 21st century revolution must be a child of citizen’s revolution . But then these are the matters , which will be debated much more in days ahead . Let ‘s see , wait and watch , what happens . हमें आशावादी ही होना चाहिये और हमारी अगली पीढ़ी का भविष्य सुनहरा ही होगा , क्योंकि वे हमसे बेहतर समझ वाले और साहसी होंगे , इसमें कोई शक नहीं है | मैंने अपनी क्षमता भर अपना मंतव्य स्पष्ट करने का प्रयास किया है | दरअसल हम जीवन में कोई कल्पना लेकर नहीं चल सकते | संघर्षों के रूप ही समाज की रूप रेखा तय करेंगे | और इन संघर्षों का जनता की जीवनस्तर की सुधार की लड़ाई से जुड़े रहना ही बदलाव की गारंटी है | आपको बहुत बहुत धन्यवाद | बीच में अंग्रेजी का प्रयोग फ्लो में हो गया | क्षमा प्रार्थी हूँ |

के द्वारा: aksaditya aksaditya

प्रिय श्री शुक्ल जी, आपका यह कहना कि वामदल कांग्रेस को नीतियों के आधार पर समर्थन देते हैं. गले नहीं उतरता है. कांग्रेस की नीतियाँ क्या हैं, सामंतवाद, फासीवाद और भ्रष्टाचार. फासीवाद का नमूना हम 1975 -76 की इमरजेंसी और 1984 के सिखों के नर संहार में देख चुके हैं दुर्भाग्यवश इमरजेंसी में भी .वाम नें कांग्रेस से सहयोग किया था. राष्ट्रीय राजनीति में वाम की भूमिका कांग्रेस के पुछल्ले की रही है यही i कारण है वाम विकल्प के रूप में विकसित नहीं हो पाया. मजदूर आन्दोलनों में भी वाम की भूमिका ढलती हुई है. जहां तक मुलायम सिंह, लालू यादव जैसी जातिवादी भ्रष्ट ताक़तों से सहयोग का सवाल है यह विशुद्ध मौका परस्ती है. विश्वसनीयता निश्चित ही महत्वपूर्ण है. आप मानें या न मानें, वाम की विश्वसनीयता घट रही है. बाबा रामदेव कोई मुद्दा नहीं हैं. भ्रष्टाचार है. गुस्ताखी माफ़ करेंगे

के द्वारा:

आदरणीय आदित्य जी! अपने बहुत ही अच्छा लेख लिखा है, पर अपने जो शीर्षक दिया है आपका विषयवस्तु कहीं न कहीं भटक गया है आपने बातें तो करनी चाही भ्रष्टाचार , सत्याग्रह औरत बर्बर दमन की, पर आपका सारा ध्यान केन्द्रित रहा बाबा रामदेव से हुई कुछ भूलों पर ! इसमें संदेह नहीं की बाबा रामदेव ने कुछ मुलभुत गलतियाँ की जिससे की ये अनशन उतना प्रभावी न हो सका जितना अपेक्षित था! पर अगर उनके इस आन्दोलन को सरकार पूर्णतया असफल मन रही है तो ये उसका भ्रम है जो की अगले चुनावों में टूट जाएगा! ये जो हिन्दू संगठनों पर लगातार आक्षेप लगाये जा रहे हैं क्या ये साम्प्रदायिकता को बढ़ावा नहीं देते हैं! क्या संघ एवं बीजेपी इस देश के नहीं हैं ! वो राष्ट्र से सम्बंधित मुद्दों में अपनी भागीदारी नहीं दिखा सकते हैं! क्या देशी कांग्रेस की जागीर है की वो जिसे सांप्रदायिक होने का प्रमाण पत्र जरी करें वो ही सांप्रदायिक है! ये जो हिन्दू विरोध को ही धर्म निरपेक्षता बनाया जा रहा है ये देश के संघीय ढांचे के लिए अत्यंत घातक है! कांग्रेस के कुछ मंत्री गन लगातार हिन्दुवों पर इसलिए हमला बोल रहे हैं की कब कोई हिन्दू संगठन या बीजेपी इस पर कोई कड़ी प्रतिक्रिया दें और ये फिर उस पर सांप्रदायिक होने का आरोप और मजबूत कर सकें! क्या उच्त्तम न्यायलय एवं मीडिया को इसमें कोई साम्प्रदायिकता नजर नहीं आति१ हे राष्ट्र के नागरिकों कब तक सोवोगे! कब तक इस साम्प्रदायिकता का जो की मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस के द्वारा पोषित हो रहा है , को जड़ से उखड फेंकने का संकल्प नहीं लोगे! कौन कौन इस मुहीम में शामिल होगा हमारे साथ?

के द्वारा:

आप जैसे लोग केवल टिप्निया ही कर सकते हैं, लेकिन रामदेव बाबा ने जो भ्रस्ट व्यवस्थ, भ्रस्ट सरकार और लोगो से लूटे धन को विदेशी बैंको मैं जमा करने के खिलाफ जो आन्दोलन छेड़ा हैं ऐसे आन्दोलन के बारे मैं आप जैसी परवर्ती रखने वाले लोग कभी खवाब मैं भी ऐसा करने की नहीं सोच सकते हैं, क्योकि आप जैसे लोगो मैं इतनी इच्छा शक्ति नहीं होती हैं जितनी बाबा जैसी सोच रखने वालो या देश हित मैं सोचने वालो मैं होती हैं, मैं बाबा को जब से जानता हूँ जब बाबा मेरे गाँवा आये थे, बाबा ने इच्छा शक्ति से उस समय भी अन्नं त्याग रखा था और आज भी बाबा ने अन्नं त्याग रहा हैं, बाबा ने कुछ करने की ठानी और आज भले ही बाबा के साथ सरकार धोका कर रही हैं, लेकिन दृढ इच्छा शक्ति रखने वाले बाबा ही नहीं किसी भी व्यक्ति को अपने लक्षय की प्राप्ति जरूर होती हैं, परन्तु आप जैसे लोग केवल टिप्निया करने के अलावा कुछ नहीं कर सकते, किसी भी अच्छे कार्य करने वाले के खिलाफ तुच्छ सोच रखने वाले ही टिप्निया करते हैं.

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी , नमस्कार | विलम्ब से संपर्क में आ रहा हूँ , इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूँ | आपके द्वारा उठाये गये प्रश्न कि क्या भीड़ खुद अपना नेतृत्व कर लेगी ? वह कौन सा पूर्ण शलाका पुरुष अथवा आजमाई हुई विचारधारा है , जिसके झंडे और बेनर के नीचे जनता को इकठ्ठा होकर संघर्ष करना चाहिये , तो गारंटी के साथ व्यवस्था अवश्य बदल जायेगी ? , आज समाज में बैचैनी के साथ पूछे जा रहे हैं | कमोबेश , कुछ इसी तरह के प्रश्न दूसरे स्वरूप में विश्व पटल पर चलने वाले विचार विमर्शों के केंद्र में हैं , विशेषकर वर्ष 2007 की विश्व व्यापी मंदी के बाद , इन प्रश्नों पर विचार तेज हुआ है | क्या समाजवादी अवधारणा बीसवीं शताब्दी में ही खत्म नहीं हो गयी ? क्या पूंजीवाद ने समाजवादी अवधारणा को हरा नहीं दिया ? क्या वे जो अभी भी समाजवाद की वकालत कर रहे हैं , यूटोपियन नहीं है कि जो एक ऐसा स्वप्न देख या दिखा रहे हैं , जो सुखद तो है , पर , जिसके पूरे होने की कोई संभावना नहीं है | इन प्रश्नों पर दो तरह के विचार समूह सामने आ रहे हैं | दोनों यह तो मानते हैं कि वर्त्तमान (पूंजीवादी) व्यवस्था पूरी तरह सड़ चुकी है परन्तु उनके मध्य इस बात को लेकर मतभेद है कि इसे किस प्रकार की विश्व व्यवस्था बदलेगी ? एक समूह गैर पूंजीवादी व्यवस्था व्यवस्था तो चाहता है किन्तु वर्त्तमान व्यवस्था के तीनों चारित्रिक गुण श्रेणीबद्ध समाज , शोषण और ध्रुवीकरण को बनाए रखते हुए | दूसरा विचार समूह एक ऐसी व्यवस्था गैर पूंजीवादी व्यवस्था चाहते हैं , जो अभी तक कभी अस्तित्व में ही नहीं रही , एक लोकतांत्रिक और समतावादी व्यवस्था | उपरोक्त दोनों समूहों की मतभिन्नता से इतर , मैं यह विश्वास करता हूँ कि आज विश्व का जनसमुदाय वास्तव में व्यवस्थागत संकट में है और आने वाले 25 से 50 वर्षों के भीतर वह वर्त्तमान व्यवस्था के बदले में कैसी व्यवस्था चाहता है , इस मसले को सुलझा लेगा | हम निश्चित रूप से स्वयं को किसी दूसरी व्यवस्था में पायेंगे , जो वर्त्तमान व्यवस्था से अच्छी भी हो सकती है और इससे खराब भी | ऐतिहासिक रूप से अभी तक कोई भी व्यवस्था अर्थपूर्ण सन्दर्भ में न तो लोकतांत्रिक रही है और न ही समतावादी | इससे अधिक , अभी कुछ नहीं कहा जा सकता | इतिहास में परिवर्तनों की रफ़्तार से मनुष्य की जिंदगी की अवधि कम होती है | इसीलिये महत्त्व व्यक्ति का नहीं संगठन और सिद्धांतों का होता है | इसलिए किसी शलाका पुरुष के पीछे खड़े होकर आंदोलन करने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता | हम परिवर्तन के दौर से ही गुजर रहे हैं , पर ये वैसे नहीं हैं और न होंगे जैसे हमने बीसवीं शताब्दी में देखे | इसे बहुत अच्छे से वर्ष 2005 के वर्ल्ड सोशल फोरम में वेनेलुजुएला के प्रेसीडेंट शावेज ने पेश किया था | उन्हीं के शब्दों में "We have to re-invent socialism" | पर , यह वैसा समाजवाद नहीं हो सकता , जैसा हमने सोवियत संघ में देखा था | जैसे आन्दोलन अभी विश्व स्तर पर देखे जा रहे हैं , मध्यपूर्व के देशों सहित भारत में भी , उनसे तो लगता है कि यह प्रतिद्वंदिता के बजाय सहयोग पर आधारित होना चाहिये | छोटे स्तर पर यह संक्रमण का दौर है और जनता के अनेकों आंदोलन अभी दक्षिण और वाम , दोनों तरह की राजनीति से दूर स्वत:स्फूर्त तरीके के होंगे , जैसे कि पूंजीवाद की शुरुवात में 17वीं , 18वीं और 19वीं शताब्दी में भारत सहित विश्व के तमाम देशों में हुए थे , औद्योगिकीकरण के प्रारंभिक दौर में , जब नई नई मशीनों का आगमन हुआ और लोग उअनसे वाकिफ नहीं थे , उनके सामने कोई विचारधारा नहीं थी और उनके आंदोलन , अधिकाँश , स्वत:स्फूर्त और नेतृत्वविहीन या फिर स्थानीय याने स्वयं के बीच से निकले नेतृत्व के अंदर हुए थे और ऐसे आन्दोलनों से नेतृत्व , विचारधारा निकली थी | इसलिए प्रारंभ के आंदोलन का स्वरूप मशीन विरोधी था , जिसे कुछ लोग प्रगति विरोधी भी कहते हैं | जबकि , वास्तव में वे नए नए पूंजीवाद के , शोषण के नए नए तरीकों के खिलाफ , अपना जीवन बचाने और उसमें सुधार करने के आंदोलन थे | तात्कालीन और आज की परिस्थितियों में फर्क शोषण के बदले हुए तरीकों का है | मशीम के साथ साथ , आज जमीन की लड़ाई भी है , उचित मुआवजे की लड़ाई भी है | बाकी पूंजीपतियों के द्वारा बेतहाशा मुनाफ़ा बटोरना , आवाम को देश की आय से उचित हिस्सा नहीं देना , उनकी बुनियादी जरूरतों को बाजार का हिस्सा बनाना , जैसे पानी , हवा और प्रकृति का अंधाधुंध दोहन , सब जैसे का तैसा है | उस समय विचार सहारा नहीं थी और आज कमोबेश सभी विचार धाराएं नवउदारवाद के सामने परोक्ष और अपरोक्ष समर्पण कर चुकी हैं | इसीलिये आज हो रहे आन्दोलनों के स्वरूप में बदलाव आया है | इसका प्रमाण किसानों के वे आंदोलन हैं ,जो बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के हाल में लड़े गये हैं और किसानों ने राजनीतिज्ञों को भगा दिया | ऐसा ही हमने अन्ना के आंदोलन में भी देखा | अन्ना को किसी को लामबंद करने की आवश्यकता नहीं पड़ी , लोग स्वयं लामबंद होते गये | यह समझने में अभी सभी को वक्त लगेगा कि राजनीति से दूर का मतलब , राजनीतिविहीन नहीं है | मतलब है कि वर्त्तमान राजनीति को नापसंद करना , चाहे उसका प्रकार कैसा भी क्यों न हो | यह एक नयी राजनीति के शुरुवात के लक्षण हैं | अब इस सबके परिपक्व होने तक ज़िंदा रहना या न रहना , अपने बस में तो नहीं है | और फिर रहे भी तो उसमें हस्तक्षेप करने लायक रहेंगे या नहीं , कौन बता सकता है ? इंतज़ार और वर्त्तमान में तर्कपूर्ण , विवेकपूर्ण , व्यक्तिवाद से दूर , लोकतांत्रिक और सबको साथ लेकर चलने वाले विचारों को ज़िंदा रखना , उनके लिये जोर देना और उनको संघर्ष में बदलने में योगदान देना और आगे की पीढ़ी को उसके लिये तैयार करना तथा उन हालातों को उसे सौंप देना ही फौरी काम हो सकता है | सभी की यह धारणा रहती है कि भ्रष्टाचार से अनेक समस्याओं का जन्म होता है | यह सही भी है | पर, भ्रष्टाचार स्वयं अनेक समस्याओं से पैदा होता है | " A systam ( society) which encourage greediness , may it be in the name of competition or development of individuals , in it’s members , gives birth to corruption" | A 21st century revolution must be a child of citizen's revolution . But then these are the matters , which will be debated much more in days ahead . Let ‘s see , wait and watch , what happens . हमें आशावादी ही होना चाहिये और हमारी अगली पीढ़ी का भविष्य सुनहरा ही होगा , क्योंकि वे हमसे बेहतर समझ वाले और साहसी होंगे , इसमें कोई शक नहीं है | मैंने अपनी क्षमता भर अपना मंतव्य स्पष्ट करने का प्रयास किया है | दरअसल हम जीवन में कोई कल्पना लेकर नहीं चल सकते | संघर्षों के रूप ही समाज की रूप रेखा तय करेंगे | और इन संघर्षों का जनता की जीवनस्तर की सुधार की लड़ाई से जुड़े रहना ही बदलाव की गारंटी है | आपको बहुत बहुत धन्यवाद | बीच में अंग्रेजी का प्रयोग फ्लो में हो गया | क्षमा प्रार्थी हूँ |

के द्वारा: aksaditya aksaditya

आदरणीय डा. साहब , नमस्कार , विनम्रता पूर्वक निवेदन करना चाहूँगा कि वामपंथियों के द्वारा कांग्रेस सरकार का समर्थन , उनकी नीतियों के तहत वे करते आये हैं | उनके कार्यक्रम के अनुसार उनका प्रथम लक्ष्य देश में जनवादी क्रांती याने धर्मानिरपेक्ष और लोकतांत्रिक दलों का मोर्चा बनाकर एक जनवादी सरकार की स्थापना है और फिर उसके तहत पूंजीवाद का विस्तार , जिससे उत्पादन औद्योगिक और कृषि दोनों , अपने चरम पर पहुंचे | इसीलिये वे केवल कांग्रेस नहीं , भारत के साम्प्र्दायोक दलों को छोड़कर मुलायम , लालू , चंद्राबाबू सभी के दलों के साठ तालमेल करते रहते हैं | यह तालमेल मुद्दों के आधार पर होता है | यूपीए के पिछले कार्यकाल में भी उन्होंने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर समर्थन दिया था | वैसे इस बारे में वो ही ज्यादा बेहतर बता पायेंगे | पर , उनकी तुलना रामदेव के सरकार से समझौते और फिर उसे जनता से छिपाने से करना बड़ी भूल होगी | यहाँ किसी के अविश्वसनीय होने का सवाल नहीं है | प्रश्न रामदेव के व्यक्तिवादी और साम्प्रदायिक आंदोलन का है , जिसका हश्र सबके सामने आ चुका है | आप खुद सोचिये , भारत में , चाहे वे आरएसस समर्थित बीजेपी हो या शिवसेना , धर्म की आड़ में वे सत्ता तक तो पहुंचे , लेकिन उसके बाद उन्होंने क्या किया | अभी भी रामदेव की मांगो का समर्थन हो सकता है , पर उनके तरीके का नहीं | चूंकि भ्रष्टाचार और काला धन बड़ा मुद्दा है , लोगों का रोष रामदेव को समर्थन दिलाता है , लेकिन क्या एक आदमी के विहम्स पर किसी लोकतंत्र को चलना चाहिये | यह आज नुकसान नहीं दिखा रहा है , लेकिन भविष्य में देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा | काले धन को लाने की मांग एकांकी नहीं हो सकती , इसे दलित जनता की रोजमर्रा की तकल्लीफों के संघर्ष के साठ ही जोडकर लड़ना पड़ेगा | वाम पंथी इस जिम्मेदारी को समझते हैं | आडवानी ने जब इस मांग को उठाया , उनसे पूछा गया कि जब उनकी सरकार थी , जिसमें वे गृह मंत्री थे , तब तो वे लोह पुरुष कहलाते थे , तब उन्होंने कदम क्यों नहीं उठाये , तो वे चुप लगा गये | विदेशों में जमा काला धन बहुत है , इसमें कोई शक नहीं , लेकिन उससे ज्यादा काला और सफ़ेद , दोनों तरह का धन इस देश के धन्ना सेठों के पास है , जिसमें से बाबा को भी दान मिलता है | जनता को पहले अपने रोजमर्रा के संघर्षों को नियोजित करना पड़ेगा , जिनसे न केवल उनकी माली हालत सुधारे , वरन , एक नयी व्यवस्था का मार्ग भी प्रशस्त हो | यह नयी व्यवस्था कैसी होगी और उसका रूप कैसा होगा , यह उन संघर्षों से ही तय होगा | इस सम्बन्ध में मैं एक जबाब आदेनीय शाही जी को यहीं लिखने जा रहा हूँ , शायद कल तक तैयार हो जायेगा | कृपया उसका अवलोकन कर लेंगे |

के द्वारा:

आदरणीय तिवारी जी , सादर नमस्कार , मैं अब बाबा के अनशन के मामले में कोई और विचार इसलिए नहीं दे रहा हूँ कि कमेंट्स बाबा को केन्द्र में रखकर किये जा रहे हैं , जबकि किये जाने चाहिये भारत के लोकतंत्र , उसकी खामियों के बावजूद , अस्सी करोड़ लोगों को उसकी आवश्यकता , बाबा की जिद और किसी आंदोलन को चलाने में लगने वाली निपुणता , पूंजीवाद के बारे में ज्ञान और उनकी क्रांती की तथाकथित धारणा को ध्यान में रखकर | किसी एक क्षेत्र में मेधावी होने का अर्थ यह नहीं होता कि आप उससे पूरे समाज को हांकने की कोशिश करें | मेरे कमेन्ट अनपढ़ को इसी आशय में लिया जाना चाहिये | कृपया मेरे इसके बाद लिखे लेख " भ्रष्टाचार , सत्याग्रह और बर्बर दमन" को पढ़ें , शायद काफी भ्रान्तियां दूर होंगी | व्यक्तिगत दुर्भावना और मोह , दोनों से ज्यादा महत्वपूर्ण सिद्धांत होते हैं और वह विवेचना सभी कर रहे हैं | जो आज गलत हैं , कल गलत सिद्ध हो जायेंगे और जो आज सही है , कल सही सिद्ध हो जायेंगे | थोड़े धैर्य की जरुरत अब सभी को है | वैसे मैंने कोई अनोखी बात नहीं कही है , सिर्फ थोड़े पहले कह दिया | हाल में अन्ना का बयान और बाद की घटनाएं , मेरे आलेख की पुष्टि कर रहे हैं | आपके विचारों के लिये आपको धन्यवाद |

के द्वारा:

आदित्य जी, सादर प्रणाम, लगता है कि आपको किसी अच्छे मानसिक चिकित्सक की आवश्यकता है, जो आपने इतना कुछ लिख दिया. लगता है आपकी बाबाओं से काफी अच्छी जान पहचान है. आपको उस रामलीला मैदान में सिर्फ बाबा ही दिखाई दिया, बच्चे, बूढ़े और औरतें नहीं दिखाई दिए, जिन पर जुल्म हुआ, वो तो आराम से सो रहे थे, अपने देश की धरती पर, लेकिन उन्हें कैसे खदेड़ा गया, ये आपने नहीं देखा, लग रहा था जैसे कोई विदेशी हुक्मरान के इशारे पर हो रहा था ये सब कुछ. बाबा का हर बुरा पक्ष आपने दिखा दिया लेकिन क्या बताएँगे कि भारत की जनता का क्या बुरा पक्ष है, क्योंकि (जैसा आप कहते हैं) वो तो दोनों तरफ से ठगी गयी है. अगर बाबा (जैसा आप कहते हैं) भाजपा और RSS के एजेंट हैं. तो मैं यही कहूँगा शायद आप किसी न किसी रूप में कांग्रेस के एजेंट होंगे...जो उनकी इस काली करतूत पर खुश हो रहे हैं और देश की जनता को लगी चोटों पर नमक छिड़क रहे हैं......

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के द्वारा:

आदरणीय राजीव जी , कांग्रेस या सरकार , या उस उद्देश्य के लिये किसी भी राजनैतिक दल को दूध का धुला समझने की भूल मैं कभी नहीं करता | वे कुछ भी कर सकते हैं , पर इससे हमारी जिम्मेदारियां कम नहीं हो जातीं | रजत शर्मा आपकी अदालत चला चला कर इस व्यवस्था को वैसी ही अदालत समझने लगे हैं | चीजें आसान नहीं हैं | यह एक छोटा संक्रमण है , उथल पुथल ज्यादा होगी , परिणाम कम मिलेंगे | मैं अब बाबा के मामले में कोई और विचार इसलिए नहीं दे रहा हूँ कि व्यक्तिगत दुर्भावना और मोह , दोनों से ज्यादा महत्वपूर्ण सिद्धांत होते हैं और वह विवेचना सभी कर रहे हैं | जो आज गलत हैं , कल गलत सिद्ध हो जायेंगे और जो आज सही है , कल सही सिद्ध हो जायेंगे | थोड़े धैर्य की जरुरत अब सभी को है |

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प्रिय शुक्ल जी, सादर नमस्कार. आपकी पिछली पोस्ट ' हम बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलता है' पर मैनें कुछ प्रश्न उठाये थे इस पोस्ट में आपने सभी बिन्दुओं की विस्तार से व्याख्या किया है. आपका यह कहना सही है कि कांग्रेस देश के बड़े पूंजीपतियों और जमींदारों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी है आपका यह कहना भी ठीक है कि बाबा नें गुपचुप सरकार से समझौत करने की कोशिश की. आपका यह कहना तथ्यों के विपरीत है कि इस देश का वामपंथी आंदोलन संसद के अंदर और संसद के बाहर लगातार काले धन को सामने लाने और उसे जमा करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने की मांग करता रहा है वामपंथी आंदोलन नें दबी जुबान से संसद के अंदर और संसद के बाहर काले धन को सामने लाने की बात अवश्य की लेकिन जन आन्दोलन कोई नहीं किया.. फिर इसी वामपंथी आंदोलन नें यूं पी ए- I सरकार बनवाने में कांग्रेस से सहयोग किया. बाबा समझौता करते हैं तो गलत और वामपंथी आंदोलन कांग्रेस से सहयोग करता है तो वह सही. यह कैसी दोमुहीं चाल है. बाबा और वामपंथी आंदोलन दोनों अविश्वसनीय तो जनता जाय तो जाय किसके पास.

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आदरणीय शाही जी , किसी शलाका पुरुष के पीछे तो संगठित होने का सवाल ही पैदा नहीं होता | हम आजाद भारत में ही ऐसे शलाका पुरुषों का हश्र डेक्स चुके हैं | 20वीं शताब्दी में एक विचारधारा परवान चढ़ी थी | पर , उसके अपने दोषों और शेष पूंजीवादी दुनिया के हमलों के चलते वह भी डावांडोल स्थिति में आज लगती है | पर मनुष्य के विकास का रास्ता बताता है कि वह आवश्यकता के अनुसार विचारधाराओं और निदानों को निकाल लेता है | इस संबंध में मेरे कुछ विचार है , जिनको आपसे शेयर करके मुझे अति प्रसन्नता होगी , लेकिन विचारों का यह आदान प्रदान तनिक लंबा होगा , अतएव में एक दो दिनों में आपसे मुखातिब होऊँगा | आप मेरे लेख को उत्सुकता से पढ़ते हैं , यह मुझे बहुत अच्छा लगता है और प्रोत्साहित करता है | इसके लिये आपको बहुत बहुत धन्यवाद | में जल्द ही आपसे संपर्क करूँगा |

के द्वारा:

श्रद्धेय शुक्ल जी, आपका आलेख हमेशा की तरह एक सांस में पढ़ना पड़ा । लेकिन इतना रोचक, अकाट्य से लगने वाले तर्क़ों से भरा होने के बावज़ूद वहीं छोड़ गया, जहां से चले थे । आपने कुछ व्यक्तियों शख्सियतों का बहुत बेहतरीन चारित्रिक विश्लेषण किया है, लेकिन अन्त में हमेशा की तरह किसी मुकाम तक आपका संदेश नहीं पहुंचा पाया । जनता का राजनैतिक संघर्ष व्यवस्था बदलेगा, वह तो ठीक है, लेकिन नेतृत्व कौन करेगा ? क्या भीड़ खुद अपना नेतृत्व कर लेगी ? वह कौन सा पूर्ण शलाका पुरुष अथवा आजमाई हुई सफ़ल विचारधारा है, जिसके झंडे और बैनर के नीचे जनता को इकट्ठा होकर संघर्ष करना चाहिये, तो गारन्टी के साथ व्यवस्था अवश्य बदल जाएगी, एक बार पुन: अनुरोध करना चाहूंगा कि कृपया मार्गनिर्देश प्रस्तुत करने का कष्ट करें । धन्यवाद ।

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आदरणीय डा. शंकर सिंह जी , सादर नमस्कार , आपकी अंतिम बात से मैं अपनी बात प्रारंभ करूँगा | भारतीय राजनीति को थोड़ा सा भी ध्यान से देखने वाला व्यक्ति जानता है कि कांग्रेस देश के बड़े पूंजीपतियों और जमींदारों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी है | यह मुख्य विरोधी पार्टी भाजपा से केवल इस मामले में तनिक अलग है कि साम्प्रदायिकता इसका मुख्य एजेंडा नहीं है लेकिन जब भी इसे आवश्यकता महसूस होती है , यह साम्प्रदायिकता से समझौता करने में परहेज नहीं करती है | शाहबानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को नकारने वाला क़ानून बनाने का मामला हो या बाबरी मस्जिद ध्वंस के समय नरसिम्हाराव की आपराधिक निष्क्रियता , इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं | पूंजीवादी व्यवस्था में कोई भी बुर्जुआ राजनीतिक दल तभी तक लोकतांत्रिक बना रहता है , जब तक आप उसकी सत्ता को चुनौती नहीं देते या जब तक देश के पूंजीपतियों और धन्नासेठों के हितों पर आंच नहीं आती | जैसे ही उन्हें महसूस होता है कि अब उनके हितों के ऊपर प्रहार हो रहा है , वे लोकतंत्र का बाना उतारकर तानाशाह बन जाते हैं | वर्त्तमान मामले में भी यही हो रहा है | आप इसे इस तरह और बेहतर तरीके से कह सकते हैं कि \\" एक क़ानून का राज तभी तक क़ानून का राज रहता है , जब तक आप उसे चुनौती नहीं देते , जैसे ही आप उसे चुनौती देते हैं या क़ानून को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने लगते है , या तो क़ानून बदल दिया जायेगा या क़ानून का राज खत्म करके , जंगल का क़ानून लागू कर दिया जायेगा | जैसा कि अभी दिल्ली में हुआ है कि निहत्थे और सोते हुए लोगों पर प्रशासन बर्बरता के साथ टूटा | इसकी जितनी निंदा की जाये कम है | यहाँ प्रश्न रामदेव के जनांदोलन संगठित करने में अनाडीपन का नहीं है | रामदेव स्वयं केन्द्र सरकार के फैलाए सम्मोहन में फंसे हुए थे और अपनी तथाकथित सफलता से अति आत्ममुग्ध थे , यह उनकी बातों और घोषणाओं से स्पष्ट है | यह एक जनांदोलन तो था ही नहीं , रामदेव की व्यक्तिगत महत्वाकान्क्षाओं , घमंड और अहं का सैलाब था ,जो फूटे पड़ रहा था | केंद्र सरकार ने उन्हें अन्ना के आंदोलन को कमजोर करने के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया | उस अहं में वे यह भी भूल गये कि जनांदोलन सरकारों के साथ समझौता करके नहीं चलाये जाते और उनका साबका एक कुटिल सरकार से है | अपनी आवभगत और पूछ परख में डूबे रामदेव ने सरकार से समझौता भी किया और अपने अनुयायिओं सहित देश के लोगों को धोखा भी दिया , जो किसी भी प्रकार से क्षम्य नहीं है | इस देश के 121 करोड़ लोग रीढ़ विहीन नहीं हैं | यदि ऐसा होता तो बड़ी संख्या में जो किसानों और मजदूरों के आंदोलन हो रहे है , जिसमें वे अपनी जाने गँवा रहे है , वे आंदोलन नहीं हुए होते | बाबा ने काले धन का मामला उठाया , अच्छा किया | पर इस प्रक्रिया में वे यह भूल गये कि पूंजीवादी ही सही , पर भारत के इस लोकतंत्र के लिये लोगों ने कुरबानियां दी है और उसे 1975 के काले दिनों में भी बचाकर रखा है | यदि वह लोकतंत्र इसी तरह ऐसे कुछ व्यक्तियों की इच्छाओं और सनकों पर , जिनके पास अपने किसी और प्रोफेशन की वजह से लोगों दो चार लाख लोगों को इकठ्ठा करने की ताकत है ,चलने लगा , तो देश के मजदूर और किसान अपने छोटे छोटे हितों की रक्षा के लिये भी कहाँ जायेंगे | मैंने अपने लेख \\"भारतीय उच्च वर्ग : साधारण नागरिक दायित्व बोध से भी दूर\\" में कहा है कि \\" भारतीयों का विदेश में जमा कालाधन , राजनीतिज्ञों , नौकरशाहों और उच्चवर्ग की मिलीभगत से फैले भ्रष्टाचार के दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई निहायत जरूरी है , इससे किसी को इनकार नहीं हो सकता | पर , उतना ही या उससे भी ज्यादा जरूरी उस सफ़ेद धन के एकत्रीकरण पर अंकुश लगाना और उसे बाहर निकालना भी है , जो मित्र-पूंजीवाद की सहायता से उच्चवर्ग ने अनाप-शनाप तरीकों से एकत्रित किया है और करते जा रहे हैं | थोड़ी सी ही बुद्धी लगाने से यह समझ में आ सकता है कि यदि देश से बाहर गया खरबों रुपये का काला धन पूरा का पूरा सरकारी खजाने में आ भी जाये , भ्रष्टाचारियों से हड़पी गयी लाखों करोड़ की राशी पूरी की पूरी वसूल भी हो जाये , तब भी इसकी गारंटी क्या है कि ये उच्च वर्ग सरकारों के ऊपर दबाब बनाकर नीतियां ही ऐसी नहीं बनवा लेगा कि सरकारी राजस्व का बहुतायत हिस्सा फिर उनकी तिजोरी में पहुँच जाये |\\" देश का पैसा बाहर नहीं जाना चाहिये और काला धन देश के अंदर आना चाहिये , इस पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है , पर क्या उतना पर्याप्त है | रामदेव यह मांग उठाने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं और यह मांग एकांकी नहीं हो सकती है | वे जिस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं , वह भारत का बीस रुपये रोज पर निर्वाह करने वाला समुदाय नहीं है | इसमें दो बातें महत्वपूर्ण हैं , जिनका जिक्र किये बिना किसी भी बात को समझना आसान नहीं होगा | पहली यह कि , वह आंदोलन चाहे अन्ना का हो या रामदेव का , उसके पीछे इतनी संख्या में मध्यम वर्ग इसलिए एकत्रित हुआ क्योंकि यही वह वर्ग है जो देश की अस्मिता और प्रतिष्ठता पर थोड़ी भी आंच आने पर बहुत ज्यादा प्रभावित होता है क्योंकि इसके तार दुनिया से किसी न किसी तरह जुड़े रहते हैं और इन करप्ट और लालची राजनीतिज्ञों , नौकरशाहों और धन्नासेठों की वजह से भारत की प्रतिष्ठता बहुत धूमिल हो रही थी | यह वर्ग अच्छी तरह से जानता है कि यदि काला धन आ भी जाये और भ्रष्टाचार रुक भी जाये , तो भी उस पैसे का इस्तेमाल आम आदमी के लिये नहीं होने वाला है | यहाँ तक कि रामदेव भी उसे नहीं करा सकते हैं , क्योंकि , जैसा वो खुद कह रहे थे कि उनकी लड़ाई सत्ता से नहीं है , व्यवस्था बदलने से है और बदली व्यवस्था क्या होगी और कैसी होगी , उसका कोई विजन रामदेव के पास नहीं है | हो भी नहीं सकता क्योंकि उतनी योग्यता और राजनीतिक समझ भी उनमें नहीं है | यह लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को शामिल करने के सवाल पर उनकी ढुलमुल प्रतिक्रिया से पता चल गया था | दूसरी बात यह है कि , मध्य पूर्व के देशों में हुए जनांदोलनों , विशेषकर , मिश्र की घटनाओं , ने हमारे देश के मध्यवर्ग के ऊपर यह प्रभाव डाला कि इस तरह के आन्दोलनों से सरकार से बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है | अन्ना को मिली सफलता ने भ्रांति को न केवल मध्यवर्ग में पुष्ट किया , स्वयं रामदेव भी उसका शिकार हो गये | जबकि , उन देशों की परिस्थिति और भारत की परिस्थितियों में जमीन आसमान का अंतर है | वहाँ लोग उस लोकतंत्र के लिये लड़े जो हमारे देश में पहले से ही मौजूद है , फिर चाहे वह बहुतायत लोगों को वंचना देने वाला ही क्यों न हो | यदि रामदेव इस मुगालते में नहीं होते तो गिरफ्तारी देने के बजाय वे महिलाओं के बीच में छिपते और भागने की जुगत करते नहीं फिरते | रामदेव ने जो ये किया , वह अनाडीपन नहीं , बल्कि उससे भी बड़ा और गंभीर अपराध है | वे कोई गोरिल्ला युद्ध या भगतसिंह जैसी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे | भगतसिंह ने एक विदेशी शासन का , जबकि वे जानते थे कि उनकी मौत निश्चित है , बहादुरी से मुकाबला किया था | उन्हें जेल से भागने का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने मना कर दिया था | गांधी ने भी कभी भी गिरफ्तारी से बचने के लिये मुँह छिपाकर भागने का रास्ता नहीं अपनाया | गांधी आज सरकार की लाठियां चलने पर रोते या नहीं , जैसा के रामदेव कह रहे हैं , मैं नहीं जानता पर रामदेव के भागने पर जरुर रोते | रामदेव एक जनांदोलन का नेतृत्व कर रहे थे , जिसकी अपनी जिम्मेदारियां होती हैं , जिसे वे पूरा नहीं कर पाए | अब में अंतिम बात पर आता हूँ , क्या दिल्ली की घटना को अंजाम देने के पीछे सरकार की मंशा देश को आतंकित करने की नहीं थी ? बिलकुल थी , सरकार की तरफ से जिस सौम्यता की आवश्यकता सरकार समझती थी , वह अन्ना से उसे हासिल हो चुकी थी | रामदेव सरकार से अनशन शुरू करने के पहले ही समझौता करके कमजोर पड़ चुके थे | ऐसे में सरकार को अपने को मजबूत सिद्ध करने का मौक़ा रामदेव ने ही सरकार को मुह्हैय्या कराया | सरकार ने भविष्य में कोई जनांदोलन न करे इसका सन्देश दिया तो वह अवसर रामदेव की कृपा से ही उसे मिला | आप अन्ना के आंदोलन को याद करिये , उस समय सरकार ने अन्ना के सामने समर्पण नहीं किया था ,बल्कि अन्ना का इस्तेमाल सरकार ने प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्व के समान किया था | आप भारतीय स्त्रोत के गूगल को टटोलें तो पायेंगे कि 14 मार्च से 22 मार्च,2011 के मध्य केवल तीन लेखों में अन्ना के नाम का जिक्र आया था | मार्च, 23 को अन्ना हजारे ने घोषणा की कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें मुलाक़ात के लिये बुलाया है | प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि सरकार अन्ना से लोकपाल बिल पर बात करेगी , जिसके लिये वे आमरण अनशन पर बैठने वाले हैं | इसके बाद मार्च, 24 से 31,मार्च के मध्य गूगल पर सर्च में 4281 लेखों में अन्ना का नाम आया है | मेरा इरादा किसी भी तरह , इन प्रयासों को छोटा करके आंकने का नहीं है | पर, इनसे उपजी खुमारी में डूबने के पूर्व , यह याद रखना बहुत जरूरी है कि ये प्रयास किसी भी तरह इन सरकारों या उस व्यवस्था की मूलभूत नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं लाते हैं , जिनसे आम जनता की जिंदगी में कोई फर्क पड़े | शायद कुछ बुनियादी बातों की तरफ लौटने से बात ज्यादा साफ़ हो | मनमोहनसिंह , प्रणव, या चिदंबरम और उनके मालिक अमेरिका की दुनिया में , केवल एक ही बात है , जो अपराध है , वह है गरीब का धनवानों के राज का प्रतिरोध करना या उसे चुनौती देना | उनके मुक्त बाजार में हर चीज बिकाऊ है , सांसद , मीडिया , मंत्री फिर चाहे वे केन्द्र के हों या राज्य के , न्याय , लोकतंत्र , सिविल सोसाईटी , सामाजिक कार्यकर्ता , संत और बाबा , सभी | ये राहत या संतोष देते इसलिए दिखते है कि अभी भी अच्छे और भोले लोग हैं , जो यह समझते हैं कि आयोगों और कानूनों से व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है | पर, ऐसा होने का नहीं है | इसके लिये , लोगों को खुद जागरूक होना होगा , लड़ना होगा , बाबाओं से मुक्त होकर , यह व्यवस्था गहरे तक सड़ चुकी है , रामदेव के अफलातूनी और आधे अधूरे ख़्वाबों से यह नहीं सुधरेगी | नोट , लंबा हो गया है , मुझे माफ करेंगे |

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oczप्रिय शुक्ल जी, सादर नमस्कार. आपने आकाश तिवारी जी शंकाओं के बारे में जो स्पष्टीकरण दिया है उसमें कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे अनुत्तरित रह गए हैं.मैं मानने को तैयार हूँ कि वह कोई ट्रेड यूनियनिस्ट नहीं हैं उनके जनआंदोलन का नेतृत्व करने में अनाडीपन है लेकिन मुख्य मुद्दा यह नहीं है. मुख्य्मुद्दा है विदेशी बैंकों में जो भारतीयों का अकूत धन जमा है वह वापस आना चाहिए कि नहीं. मैं समझता हूँ कि 121 करोड रीढविहीन लोगों के देश में इस मुद्दे पर ध्यान केन्द्रित करके बाबा नें महान कार्य किया है. दूसरी बात रामलीला मैदान में निहत्थे, शांतिप्रिय स्त्री पुरुषों पर लाठियां भांजने, आंसू गैस छोड़ने के पीछे सरकार की क्या मंशा थी. क्या इसके पीछे देश को आतंकित करना नहीं था जिसमें भविष्य में कोई जनआंदोलन सर न उठा सके. मुझे लगता है सरकार ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करने पर अमादा है जिसमें इमरजेंसी लगाने को उचित ठहराया जा सके. कांग्रेस का सामंतवादी और 1975 में इमरजेंसी और 1984 में सिखों के नरसंहार में फासीवादी चरित्र अनेक आशंकाओं को जन्म देते हैं. इन बिन्दुओं पर मैं आपके विचार जानना चाहूंगा. साभार

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आदरणीय आदित्य जी... नमस्कार ..... आपने कहा की जनतंत्र में अवतार और बाबा नहीं जनों का आंदोलन ही परिवर्तन और सुधार ला सकता है..... तो बाबा के पीछे खड़ी भीड़ भी इस देश की जनता ही थी... बाबा ने अगर पर्दे के पीछे डील कर ली थी तो सरकार इसे आंदोलन के सुबह ही सामने क्यों नहीं लायी... और अगर जनता को बाबा ने धोखा दे ही दिया था तो जिस जनता को बाबा ने धोखा दे दिया था..... उसी पर सरकार ने आसू गैस ओर लाठीयां भंज कर क्या किया॥ महाराष्ट्र मे जब उत्तर भारतीय पिटे तो ये लाठीयां कहाँ थी...... जब गुर्जर आंदोलन ने रेल रोक कर जन जीवन अस्तव्यस्त कर दिया था..... ओर सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा था तो तब ये आसू गैस के गोले कहाँ थे..... यदि सरकार की नियत साफ है तो क्यों नहीं उसने घोषणा की कि काले धन रखने वालों को मृत्यु दंड दिया जाएगा...... इसमे तो सरकार का भला ही था क्योकि यदि सरकार के सभी मंत्री पाक साफ है और बाबा के पास काला धन है तो इसमे तो सरकार के लिए सुविधा ही थी........ क्योकि तब बाबा को फांसी तय थी...... फिर क्यों पुलिस के माध्यम से पंडाल मे आसू  गॅस के गोलों कि बौछार के बीच बाबा को वहीं मार कर भगदड़ मे मरा घोषित करने कि तैयारी थी........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

लोकतंत्र और जनतंत्र की बात करने वाले यह भूल जाते हैं कि जनतंत्र में अवतार और बाबा नहीं जनों का आंदोलन ही परिवर्तन और सुधार ला सकता है | रामदेव ने परदे के पीछे सरकार से कोई और डील की और जनता से कुछ और कहा | यह जनता के साथ और उनके अनुयायियों के साथ धोखा है | राजनीति और व्यवस्था के बारे में भी रामदेव की समझ एक अपढ़ और कुछ नहीं जानने वाले से ज्यादा नहीं है | लेख का उद्देश्य लोगों को ये समझाना है कि ऐसे बाबाओं से बच कर चलना चाहिये | जहां तक आंदोलन का सवाल है , मैं ठीक मजदूर आंदोलन से जुड़ा व्यक्ति हूँ और सरकार की चालबाजियों को नजदीक से देखा हूँ और उनके खिलाफ आगे की पंक्ति मैं रहकर लड़ा हूँ | रामदेव से एक बार पूछो कि क्या व्यवस्था परिवर्तन के लिये लड़ाने वाले गिरफ्तारी से बचकर ऐसे भागते हैं | आपके विचारों के लिये धन्यवाद |

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जनता किये गये कामों का सिला लंबे समय तक देती है , वहीं गलतियों को जल्दी माफ कर देती है | पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु इसका उदाहरण हैं | तमिलनाडु में जनता ने मात्र पंक साल पहले के जयललिता के कुशासन को भुला दिया | उसी तरह वाममोर्चे ने जो स्थायीत्व औए वित्तीय मजबूती बंगाल को दी , उसका सिला भी उसे मिला किन्तु वहाँ एक बार फिर वित्तीय ठहराव का संकट खड़ा हो रहा था , जिसे औद्योगिक विकास किये बिना नहीं निपटा जा सकता था | यः औद्योगिक विकास भी जनता को विश्वास में लिये बिना प.ब. में नहीं हो सकता था या कम से कम वाममोर्चा इसे नहीं कर सकता था क्योंकि उसने पंचायती राज्य को असलमें अमली जामा बंगाल में पहनाया था | वो यह भूलकर अन्य राज्यों या केन्द्र सरकार की स्टाईल में आगे बड़े , जिसे जनता ने पसंद नहीं किया | अब उसी टास्ते पर ममता को जाना है , तभी वो कह रही हैं कि , विकास कैसा हो , यह जनता से पूछने के बाद विकास का रोड मेप बनेगा | कुल मिलाकर , जो मिसालें और आदतें जनता को 34 वर्षों में मिली हैं और पड़ी हैं , वो इतनी जल्दी विस्मृत नहीं होंगी | इसलिए राह आसान नहीं है | अंत में इसी फलसफे का सामना वाममोर्चा को भी करना पड़ा था , इसलिए ऐसा लगता है कि बाद के कुछ वर्ष वे जबरिया सत्ता में पैठ बनाए रहे | देश में केन्द्र सहित अधिकाँश राज्य सरकारों का भी यही हाल है | आपने प्रोत्साहित किया उसके लिये धन्यवाद |

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श्रद्धेय शुक्ल जी, आपने सही कहा है कि परम्परागत रूप से मजदूर आन्दोलन फ़ौरी मांगों तक ही सीमित रहा, जिसके कारण नियोक्ता नीतियां आमूलचूल परिवर्तन को प्रेरित नहीं हो पाईं । मजदूर हक़ को कपटपूर्ण तरीके से श्रेणियों में बांटते हुए व्यवस्था यह मान कर चलती आई है, कि इतना आंदोलन से पूर्व, तथा इतना आंदोलन के पश्चात प्रदान किया जाना चाहिये । यूनियनें और मजदूर नेता आकाओं से मिलीभगत कर हमेशा श्रम को ठगते आए हैं, और श्रम बार-बार जानबूझ कर इस ठगी का शिकार होता आया है । समाज को भी मजदूर आंदोलनों ने अपनी छवि के बारे में कोई सकारात्मक संदेश कभी नहीं दिया । मजदूर आंदोलन आजतक हड़ताल, तालाबन्दी, रोडजाम तथा औद्योगिक तबाही का ही पर्याय बनता आया, जिसने समाज और राष्ट्र की दैनन्दिक गतिविधियों पर विराम लगाकर सामाजिक क्षति पहुंचाने का ही कार्य अधिक किया । शायद यही कारण है कि हमारे देश में हंसिये हथौड़े को भय की नज़र से देखा जाता रहा, और तमाम साफ़गोई के बावज़ूद यह सिद्धान्त समाज के सर्वहारा वर्ग के लिये कभी शत प्रशिशत ग्राह्य भी नहीं बन पाया । बेचारा मजदूर अपने हक़ की लड़ाई को चाहकर भी कामयाब और लोकप्रिय कभी नहीं बना पाया । दरअसल नेतृत्व ने यदि मजदूर को टकराव की बजाय शोषक व्यवस्था को परिवर्तित करने के सापेक्ष शिक्षित और संगठित करने का कार्य किया होता, तो शायद हमारे देश की वितरण व्यवस्था आज कुछ और होती, क्योंकि मजदूर के पास वोट की ताक़त थी । मजदूर नेताओं ने इस ताक़त को अपने स्वार्थ में उपयोग किये जाने तक ही स्वयं को सीमित रखा, और खाई आज इतनी चौड़ी हो चुकी है, कि मजदूर ही हाशिये पर धकेला जा चुका है । मजदूर दिवस पर सार्थक लेख के लिये आभार ।

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आदरणीय शर्मा जी , द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान बुरी तरह तबाह हुआ था | बीसवीं सदी के आठवें दशक के अंत तक उसका पुनर्निर्माण चलता रहा | उस दौरान , जैसा की बाह्य संकट के समय सभी देशों के आम लोगों और श्रमिक , किसान तबके के साथ होता है , जापान में भी आम जनता ने देश प्रेम से ओतप्रोत होकर अपने रोष को जाहिर करने काली पट्टी बांधकर कार्य करने का तरीका अपनाया था और वहाँ सरकार हस्तक्षेप कर विवादों का निपटारा भी कराती थी | दुनिया के लगभग सभी पूंजीवादी देशों के मालिकान और सरकारें अपने मजदूरों को उसका उदाहरण देकर आंदोलन करने से रोकती थीं | इसी आधार पर सारे विश्व में यह मशहूर है कि जापान के लोग अत्यंत देशभक्त होते है और देश के लिये कितने भी घंटे और अत्यंत कम वेतन पर भी काम करने को तैयार रहते हैं | बीसवीं सदी के नौवें दशक के बाद से परिस्थिति में बहुत फर्क आ गया है और अब वहाँ भी आंदोलन के उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल होता है , जो शेष दुनिया में अपनाए जाते हैं | लेकिन , द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पैदा हुई उस भावना का अभी पूरी तरह अंत नहीं हुआ है | उस दौर की एक रोचक बात यह भी है कि एक तरफ जब जापान के आम लोग,मजदूर ,किसान इतने त्याग कर रहे थे , जापान के पूंजीपतियों , राजनीतिज्ञों , वहाँ काम कर रही ब्रिटेन और अमेरिका बेस मल्टीनेशनल कंपनियों ने इस तरह के किसी त्याग को नहीं दिखाया | उनका मुनाफ़ा वैसा ही बरकरार रहा , पूंजी का एकत्रीकरण तेज रफ़्तार से होता रहा और वहाँ के राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार करने से नहीं चूके | यहाँ तक कि वहाँ के प्रधानमंत्री तक इसमें शामिल रहे | दरअसल एक ऐसी व्यवस्था में , जैसी में हम रह रहे हैं , आंदोलन का कोई विकल्प हो ही नहीं सकता | पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपती वर्ग सरकार के दुधमुंहे बच्चे के सामान होता है और सरकारें उसे स्पून फीडिंग कराती हैं और मजदूरों , किसानों तथा कम्मैय्या वर्ग को वे उस कुत्ते , बिल्ली के समान देखती हैं , जो उस बच्चे का दूध या निवाला झपटना चाहता है | इसीलिये सरकार का व्यवहार इस वर्ग के लिये प्रताड़ना से भरा होता है | एक उदाहरण काफी होगा , केन्द्र सरकार ने पिछले छै वर्षों में कारपोरेट सेक्टर को 21 लाख करोड़ से ज्यादा की राहतें आयकर , एक्साईज और कस्टम में छूट के मार्फ़त दी हैं और उसी सरकार ने इस बजट में यह कहते हुए वेट को पांच प्रतिशत कर दिया कि कुछ राज्यों में यह पांच है और कुछ राज्यों में चार , इसलिए एक समान करने इसे पांच किया जाता है | क्या समानता लाने इसे चार नहीं कर सकते थे ? सोचिये , केन्द्र सरकार के द्वारा छटा वेतनमान दिए जाने के बाद केन्द्र के कर्मचारियों को , पीएसयू के अधिकारियों को शायद 2006 या 2007 से दस लाख तक की ग्रेच्युटी का भुगतान हो रहा है , लेकिन यही क़ानून अन्य क्षेत्र के लोगों के लिये पिछले साल मई से लागू किया गया है | कारपोरेट के मामले में एलर्ट ओर आम जनता के मामले में आपराधिक लापरवाही इसका चारित्रिक गुण है | आज तक जनता ने जो भी पाया है आंदोलन के माध्यम से पाया है | तानाशाही में आंदोलन कितना कठिन होता है , इसे उस देश के लोग ही जानते हैं जो तानाशाही में रहते हैं | हमारे देश के लोग लोकतंत्र के चलते ही आंदोलन कर पाते हैं | इसलिए लोकतंत्र उनके लिये महत्वपूर्ण है | मिश्र में लोकतंत्र के लिये हुए आंदोलन में प्राप्त शीघ्र सफलता के पीछे वहाँ के मजदूरों और कर्मचारियों के आंदोलन का बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि वे हड़ताल पर गये , लेकिन उनकी मांगे आज तक नहीं मानी गईं हैं | अन्ना के अनशन का अपना बहुत बड़ा महत्त्व है , उसे किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता | पर , ज़रा सोचिये , यदि अन्ना ने इस मांग पर आमरण अनशन किया होता कि शिक्षा के निजीकरण को सरकार के द्वारा दिए गये प्रोत्साहन और सहूलियतों के चलते झुण्ड के झुण्ड ढेरों हिदी , अंग्रेजी स्कूल खुले है , जहां शिक्षकों को 500 , 700 , रुपयों से लेकर 1500 . 2000 या अधिकतम 3000 रुपयों में शिक्षा देने कहा जाता है और सामाजिक और आर्थिक स्थितियों के मारे हमारे युवा उसे स्वीकार करने बाध्य हैं , इन शिक्षकों को वही वेतनमान दिया जाए , जो राज्य सरकारें अपने शिक्षा कर्मियों को दे रही हैं , तो क्या सरकार अन्ना के सामने झुकती और इससे भी अहं कि क्या अन्ना ऐसी किसी मांग को लेकर अ